प्रियंका भारद्वाज/विश्व दर्शन दिवस के अवसर पर टी०पी०एस० कॉलेज, पटना के दर्शनशास्त्र विभाग एवं आईक्यूएसी के तत्त्वावधान में आज “वैश्विक समाज के समकालीन संकट और बौद्ध दर्शन” विषय पर एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्राचार्य प्रो० तपन कुमार शाण्डिल्य के कर-कमलों द्वारा मुख्य वक्ता प्रो० डॉ० श्यामल किशोर को “शिक्षा रत्न सम्मान” प्रदान कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कॉलेज के प्राचार्य प्रो० (डॉ०) तपन कुमार शाण्डिल्य ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो० शाण्डिल्य ने कहा कि वैश्वीकरण ने जहाँ विश्व को एक सूत्र में बाँध दिया है, वहीं इसके दुष्परिणामस्वरूप युद्ध-संकट, हथियारों की होड़, राजनीतिक ध्रुवीकरण, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय असंतुलन, आर्थिक असमानता तथा सामाजिक तानाबाना का छिन्न-भिन्न होना जैसे संकट उत्पन्न हुए हैं। उपभोक्तावाद के कारण मनुष्य बाहरी उपलब्धियों के पीछे भागते हुए करुणा और शांति से वंचित हो रहा है। चिंता, अवसाद, क्रोध, अकेलापन एवं असंतोष बढ़ रहा है। यह केवल राजनीतिक-आर्थिक संकट नहीं, अपितु गहरा आध्यात्मिक एवं नैतिक संकट भी है।
प्रो० शाण्डिल्य ने कहा कि इन संकटों का निवारण बौद्ध दर्शन में निहित है। चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग, करुणा, मैत्री, समभाव, ध्यान एवं संयम के द्वारा मनुष्य आन्तरिक शान्ति प्राप्त कर सकता है। बौद्ध अर्थशास्त्र में लोभ, अति-उपयोग एवं संसाधनों के अतिदोहन का निषेध करते हुए मध्यम मार्ग अपनाने तथा सम्यक आजीविका में शुचिता-न्याय को अपनाने पर बल दिया गया है। इसी कारण सतत विकास (Sustainable Development) और हरित अर्थव्यवस्था (Green Economy) की अवधारणा बौद्ध दर्शन के अत्यन्त निकट है। डिजिटल ओवरलोड के इस युग में मनुष्य अपनी चेतना से दूर होता जा रहा है और नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है। बौद्ध दर्शन इन सबका समाधान आन्तरिक शान्ति, आत्म-संयम एवं स्मृति-ध्यान (Mindfulness) के माध्यम से प्रस्तुत करता है।
मुख्य वक्ता, रामेश्वर महाविद्यालय, मुजफ्फरपुर के प्राचार्य एवं प्रख्यात दर्शनशास्त्री प्रो० डॉ० श्यामल किशोर ने कहा कि बौद्ध दर्शन वैदिक ज्ञान-मीमांसा, न्याय एवं कर्मकाण्डों के प्रत्युत्तर में उत्पन्न एक वैज्ञानिक एवं अनुभव-आधारित दर्शन है। यह नास्तिक होते हुए भी अन्धविश्वासों का खण्डन करता है। दुःख और दुःख-निवृत्ति ही इसका मूल विषय है। अज्ञान ही दुःख का मूल कारण है, जिससे अहंकार और पहचान-संकट उत्पन्न होता है। तृष्णा और आसक्ति ही वैश्विक संकटों (पर्यावरणीय संकट सहित) का मुख्य कारण हैं। सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक व्यायाम, सम्यक आजीविका आदि अष्टांगिक मार्ग के द्वारा सर्वमुक्ति और सर्वकल्याण सम्भव है। क्षणिकवाद, अनात्मवाद एवं पंचशील बौद्ध दर्शन की विशिष्टता हैं। “अप्प दीपो भव” इसका सर्वोच्च सन्देश है। महात्मा बुद्ध मार्गदाता हैं, मोक्षदाता नहीं। उनकी सोच पूर्णतः वैज्ञानिक है।
आईक्यूएसी को-ऑर्डिनेटर प्रो० रूपम ने कहा कि वैश्वीकरण के दौर में सांस्कृतिक जुड़ाव के साथ-साथ आर्थिक असमानता और आतंकवाद भी बढ़ रहा है। इनका मुकाबला केवल अहिंसा, सत्य और अपरिग्रह से ही सम्भव है। ध्यान, धारणा और समाधि द्वारा हम स्वयं को समझ सकते हैं।
आयोजन सचिव प्रो० विजय कुमार सिन्हा ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि तनावपूर्ण वातावरण में बौद्ध दर्शन पर यह व्याख्यान सभी के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। हमें इसे जीवन में अपनाना चाहिए।
कार्यक्रम का संचालन डॉ० मनीष कुमार चौधरी ने कुशलतापूर्वक किया।
इस अवसर पर प्रो० अंजलि प्रसाद, डॉ० शशि भूषण चौधरी, डॉ० प्रशान्त कुमार, डॉ० मुकुन्द कुमार, डॉ० दीपिका शर्मा, डॉ० नूतन कुमारी, डॉ० ओंकार पासवान, डॉ० हंस कुमार सिंह, डॉ० सुनीता कुमारी, श्री अवनीत भूषण, शिवम् पराशर सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित थे।





























