80वां स्वतंत्रता दिवस – सप्तधारा से विकसित होगा भारत
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 16 अगस्त :: शनिवार को भारत ने अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाया। यह केवल तिरंगा फहराने, राष्ट्रगान गाने और स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करने का अवसर नहीं था, बल्कि आठ दशकों की यात्रा का हिसाब लेने और आने वाले भारत की दिशा, लक्ष्य तथा नियति को समझने का भी क्षण था। लाल किले की प्राचीर से निकला प्रत्येक शब्द इसलिए महत्वपूर्ण था कि उसमें अतीत की स्मृतियों के साथ भविष्य के भारत का खाका भी दिखाई दिया।
विशेष रूप से “शक्ति की सप्तधारा” को केवल किसी राजनीतिक भाषण या चुनावी रैली के नजरिये से देखना भारत की सभ्यता और उसके सांस्कृतिक संकेतों को सीमित कर देना होगा। भारत की परंपरा में सात केवल एक संख्या नहीं है। सात पूर्णता, संतुलन, विविधता में एकता और जीवन के अलग-अलग आयामों के समन्वय का प्रतीक रहा है। आज जब भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है, तब सात राष्ट्रीय क्षमताओं को एक दिशा में प्रवाहित करने की कल्पना अपने भीतर गहरा सांस्कृतिक और रणनीतिक अर्थ रखती है।
भारतीय चिंतन में सात का अंक सदियों से विशेष महत्व रखता आया है। सप्तऋषि ज्ञान की निरंतर परंपरा के प्रतीक हैं। सात दिन समय की गति को व्यवस्थित करते हैं। सात रंग प्रकृति के प्रकाश को विविधता देते हैं। सात महाद्वीप पृथ्वी की व्यापकता का बोध कराते हैं। विवाह संस्कार में सप्तपदी केवल सात कदम नहीं हैं। वे जीवनभर साथ चलने के सात संकल्प हैं। दो व्यक्तियों के बीच संबंध को सामाजिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारी में बदलने वाली यह परंपरा बताती है। संगीत में सात स्वर सा, रे, ग, म, प, ध, नि, अपने आप में सीमित दिखाई देते हैं, लेकिन इन्हीं से असंख्य राग, धुन और भावनाएं जन्म लेती हैं। योग परंपरा में सात प्रमुख चक्र चेतना के विभिन्न स्तरों से जोड़े जाते हैं। सूर्यदेव के रथ के सात अश्व गति, ऊर्जा और प्रकाश के प्रतीक माने जाते हैं।
पौराणिक साहित्य में सप्तलोक, सप्तद्वीप और सप्तसिंधु जैसे उल्लेख भी मिलते हैं। सप्तमातृका, सप्तधान्य, सप्तगण, सप्तकल्प और सात जन्म जैसी अवधारणाएं भारतीय सांस्कृतिक चेतना में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती हैं। इन सभी धारणाओं में एक साझा संदेश छिपा है अलग-अलग शक्तियों का संतुलित मेल ही संपूर्णता पैदा करता है। यही बात आधुनिक राष्ट्र निर्माण पर भी लागू होती है। कोई देश केवल कृषि से विकसित नहीं हो सकता है, केवल उद्योग से भी नहीं, केवल तकनीक पर्याप्त नहीं है और केवल रक्षा शक्ति से समृद्धि नहीं आती है। विकास तब स्थायी और व्यापक बनता है, जब उसकी अनेक धाराएं एक-दूसरे की पूरक बनकर एक दिशा में बहती हैं।
आज भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि विकास को केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि एक समग्र राष्ट्रीय क्षमता के रूप में देखा जाए। नई सप्तधारा में विनिर्माण, कृषि एवं खाद्य उत्पादन, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार, गति शक्ति, रक्षा शक्ति, सौम्य शक्ति तथा समग्र श्वेत, हरित और नील, अर्थव्यवस्था को स्थान दिया गया है। इन सातों क्षेत्रों को अलग-अलग विभागों या योजनाओं की तरह देखना इस विचार की व्यापकता को कम कर देगा। वास्तव में ये सातों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। विनिर्माण को कृषि से कच्चा माल चाहिए। कृषि को तकनीक चाहिए। तकनीक को ऊर्जा और कुशल मानव संसाधन चाहिए। विनिर्माण और कृषि को बेहतर बाजार तथा तेज परिवहन चाहिए। देश की आर्थिक शक्ति को सुरक्षित रखने के लिए रक्षा शक्ति आवश्यक है। दुनिया में अपनी पहचान और प्रभाव बढ़ाने के लिए सौम्य शक्ति जरूरी है। और इन सभी के बीच श्वेत, हरित और नील अर्थव्यवस्था भारत की सामाजिक तथा पर्यावरणीय स्थिरता का आधार बन सकती है। सप्तधारा का वास्तविक संदेश है विकास की धाराएं अलग-अलग नहीं, परस्पर जुड़ी हुई है।
पहली धारा- भारत लंबे समय तक सेवा क्षेत्र की ताकत के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन 21वीं सदी की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत विनिर्माण क्षमता के बिना कोई भी बड़ा राष्ट्र आर्थिक रूप से पूर्ण शक्ति नहीं बन सकता। मोबाइल फोन से लेकर सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर रक्षा उपकरण, ऑटोमोबाइल से लेकर मशीनरी और फार्मास्यूटिकल्स से लेकर हरित तकनीक तक भारत के सामने विशाल अवसर हैं। विनिर्माण केवल कारखाने लगाने का नाम नहीं है। इसका अर्थ है रोजगार, कौशल, अनुसंधान, आपूर्ति श्रृंखला, निर्यात और स्थानीय उद्यमिता का विस्तार। यदि भारत अपने गांवों, कस्बों और छोटे शहरों तक उत्पादन की संस्कृति पहुंचा सके, तो विनिर्माण आर्थिक विकास के साथ सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी बन सकता है। ‘मेड इन इंडिया’ को ‘मेड फॉर द वर्ल्ड’ में बदलना इस धारा की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
दूसरी धारा- भारत की आत्मा में कृषि का स्थान आज भी केंद्रीय है। कृषि केवल किसान की आय का विषय नहीं है; यह खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार, पोषण और सामाजिक स्थिरता से जुड़ी हुई है। भविष्य की कृषि पारंपरिक खेती और आधुनिक तकनीक का मेल होगी। ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मौसम आधारित सलाह, बेहतर बीज, सिंचाई तकनीक, भंडारण, कोल्ड चेन और खाद्य प्रसंस्करण किसानों की उत्पादकता और आय दोनों बढ़ा सकते हैं। भारत को केवल अनाज पैदा करने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक खाद्य प्रसंस्करण और खाद्य निर्यात की बड़ी शक्ति बनना होगा। कृषि से उद्योग जुड़ेगा, उद्योग से रोजगार बनेगा और रोजगार से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। यही वह चक्र है, जो कृषि को केवल जीविका से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय आर्थिक शक्ति में बदल सकता है।
तीसरी धारा- 21वीं सदी में जिस देश के पास तकनीक होगी, उसके पास प्रतिस्पर्धा की निर्णायक क्षमता होगी।कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, क्वांटम तकनीक, रोबोटिक्स, अंतरिक्ष विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसे क्षेत्र भारत के भविष्य को परिभाषित कर सकते हैं। भारत ने डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में जिस तेजी से अपनी क्षमता प्रदर्शित की है, वह इस संभावना का संकेत है कि देश केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसका निर्माता भी बन सकता है। लेकिन इसके लिए विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, स्टार्टअप और उद्योग के बीच मजबूत संबंध बनाना होगा। प्रतिभा को अवसर देना होगा और असफलता को नवाचार की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करना होगा। जिस भारत ने कभी तकनीक आयात की, वही भारत कल तकनीक निर्यात करने वाला राष्ट्र बन सकता है।
चौथी धारा- विकास की गति केवल उत्पादन पर निर्भर नहीं करती। उत्पाद बाजार तक कितनी तेजी से पहुंचता है, किसान की उपज मंडी तक कितनी आसानी से जाती है, बंदरगाह से माल देश के भीतर कितनी तेजी से पहुंचता है और शहरों के बीच लोगों की आवाजाही कितनी सुगम है ये सभी आर्थिक शक्ति के निर्णायक तत्व हैं। यहीं गति शक्ति की भूमिका सामने आती है। सड़क, रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डे, जलमार्ग, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल कनेक्टिविटी को एकीकृत करना भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ा सकता है। एक बेहतर परिवहन नेटवर्क देश की दूरी घटाता है। दूरी घटती है तो समय बचता है। समय बचता है तो लागत घटती है। लागत घटती है तो भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनते हैं। इसलिए गति शक्ति केवल इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक दक्षता का आधार है।
पांचवीं धारा- भारत की विकास यात्रा सुरक्षित वातावरण के बिना पूरी नहीं हो सकती। दुनिया तेजी से बदल रही है। पारंपरिक युद्ध के साथ साइबर युद्ध, ड्रोन, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और समुद्री सुरक्षा जैसी नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। ऐसे समय में आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन केवल सुरक्षा की आवश्यकता नहीं, बल्कि औद्योगिक विकास का अवसर भी है। यदि भारत अपने रक्षा उपकरणों का निर्माण स्वयं करता है, तो वह सुरक्षा के साथ तकनीकी क्षमता, रोजगार और निर्यात की संभावनाएं भी बढ़ाता है। भारत की रक्षा शक्ति का अंतिम उद्देश्य युद्ध नहीं, बल्कि शांति को सुरक्षित रखने की क्षमता होना चाहिए। सामर्थ्य ही वह आधार है, जो राष्ट्र को आत्मविश्वास के साथ अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की क्षमता देता है।
छठी धारा- किसी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या तकनीक से तय नहीं होती। उसकी संस्कृति, विचार, लोकतांत्रिक परंपरा, योग, आयुर्वेद, संगीत, सिनेमा, साहित्य, आध्यात्मिक दर्शन और मानवीय दृष्टिकोण भी उसकी वैश्विक पहचान बनाते हैं। भारत की सॉफ्ट पावर सदियों पुरानी है। योग दुनिया के अनेक देशों तक पहुंच चुका है। भारतीय संगीत और सिनेमा की वैश्विक पहुंच बढ़ रही है। भारतीय प्रवासी समुदाय अनेक देशों में भारत की जीवंत कड़ी है। भारत की सौम्य शक्ति का सबसे बड़ा आधार उसका संदेश हो सकता है वसुधैव कुटुंबकम्। दुनिया में प्रभाव स्थापित करने का एक रास्ता शक्ति प्रदर्शन है, दूसरा रास्ता विश्वास अर्जित करना। भारत के लिए दूसरा रास्ता अधिक स्वाभाविक और स्थायी हो सकता है।
सातवीं धारा- सप्तधारा की सबसे व्यापक अवधारणा समग्र अर्थव्यवस्था में दिखाई देती है। श्वेत अर्थव्यवस्था दुग्ध और पशुपालन क्षेत्र की ताकत को दर्शाती है। हरित अर्थव्यवस्था कृषि, पर्यावरण, वन, नवीकरणीय ऊर्जा और टिकाऊ विकास से जुड़ती है। नीली अर्थव्यवस्था समुद्र, मत्स्य पालन, समुद्री संसाधन और तटीय गतिविधियों की विशाल संभावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। भारत के लिए इन तीनों क्षेत्रों में अपार अवसर हैं। ग्रामीण भारत में डेयरी और पशुपालन अतिरिक्त आय का बड़ा स्रोत बन सकते हैं। हरित ऊर्जा भारत को ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में आगे ले जा सकती है। विशाल समुद्री तट और हिंद महासागर में रणनीतिक स्थिति भारत की नीली अर्थव्यवस्था को वैश्विक महत्व दे सकती है। यह धारा हमें यह भी याद दिलाती है कि विकास केवल बड़े शहरों और बड़े उद्योगों का नाम नहीं है। गांव, किसान, मछुआरा, पशुपालक और छोटे उद्यमी भी विकसित भारत की आर्थिक कहानी के नायक हैं।
सप्तधारा की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसकी सातों धाराएं स्वतंत्र होते हुए भी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। कृषि को तकनीक चाहिए। तकनीक को विनिर्माण चाहिए। विनिर्माण को गति शक्ति चाहिए। आर्थिक समृद्धि को रक्षा सुरक्षा चाहिए। वैश्विक प्रभाव के लिए सौम्य शक्ति चाहिए। और विकास को टिकाऊ बनाए रखने के लिए श्वेत, हरित और नील अर्थव्यवस्था चाहिए। यदि इनमें से कोई एक धारा कमजोर पड़ती है तो पूरी व्यवस्था प्रभावित होती है। इसीलिए 2047 का विकसित भारत केवल प्रति व्यक्ति आय या सकल घरेलू उत्पाद का लक्ष्य नहीं हो सकता। विकसित भारत का अर्थ होना चाहिए सुरक्षित भारत, समृद्ध भारत, आत्मनिर्भर भारत, तकनीकी रूप से सक्षम भारत, पर्यावरण के प्रति संवेदनशील भारत और विश्व में सम्मानित भारत।
स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में भारत को अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने का अधिकार है। औपनिवेशिक शासन से बाहर निकलकर लोकतंत्र को मजबूत करना, खाद्यान्न संकट से आत्मनिर्भरता तक पहुंचना, अंतरिक्ष और परमाणु क्षेत्र में क्षमता विकसित करना, सूचना प्रौद्योगिकी में वैश्विक पहचान बनाना और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में नए मॉडल प्रस्तुत करना छोटी उपलब्धियां नहीं हैं। लेकिन आठ दशक की यात्रा आत्ममंथन की मांग भी करती है। गरीबी, बेरोजगारी, असमानता, शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच, पर्यावरणीय संकट और क्षेत्रीय असंतुलन जैसी चुनौतियां अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। इसलिए स्वतंत्रता के 80वें वर्ष का उत्सव तभी सार्थक होगा, जब उत्सव के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हो। आजादी केवल अधिकार नहीं, राष्ट्र निर्माण का दायित्व भी है।
2047 में स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होंगे। उस समय भारत कैसा होगा, यह केवल सरकारें तय नहीं करेंगी। यह देश के करोड़ों नागरिकों की सामूहिक चेतना, मेहनत और जिम्मेदारी तय करेगी। विकसित भारत का लक्ष्य तभी सफल होगा, जब विकास समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा। जब युवा रोजगार खोजने के बजाय रोजगार पैदा करने की क्षमता रखेंगे। जब किसान उत्पादन के साथ मूल्य संवर्धन का लाभ उठाएंगे। जब गांव डिजिटल और भौतिक दोनों रूप से जुड़ेंगे। जब महिलाएं अर्थव्यवस्था की निर्णायक शक्ति बनेंगी। जब वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं से निकलकर उद्योग और समाज तक पहुंचेंगे और जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समान महत्व देंगे।
हर वर्ष 15 अगस्त उत्सव का अवसर होता है। लेकिन स्वतंत्रता के 80वें वर्ष का यह अवसर एक विशेष मोड़ लेकर आया है। अब स्वतंत्रता की कहानी केवल अतीत को याद करने की कहानी नहीं रह सकती। यह भविष्य को गढ़ने की कहानी बननी चाहिए। लाल किले से निकला संदेश इसी अर्थ में एक राष्ट्रीय रोडमैप की तरह देखा जा सकता है। सप्तधारा हमें बताती है कि भारत की अगली छलांग किसी एक क्षेत्र से नहीं आएगी। वह सामूहिक शक्ति के निर्माण से आएगी। जैसे सात स्वर मिलकर संगीत बनाते हैं, वैसे ही सात राष्ट्रीय शक्तियां मिलकर विकसित भारत की धुन बना सकती हैं। जैसे सप्तपदी के सात कदम विवाह को जीवन की पूर्ण यात्रा का संकल्प देते हैं, वैसे ही विकास की सात धाराएं भारत को 2047 की मंजिल तक ले जाने का संकल्प बन सकती हैं। जैसे सात रंग मिलकर इंद्रधनुष रचते हैं, वैसे ही भारत की विविध क्षमताएं मिलकर विकास का इंद्रधनुष बना सकती हैं।
स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकार का कार्यक्रम नहीं है। यह करोड़ों भारतीयों की साझा यात्रा है। भारत को अपनी सप्तधारा को केवल नीतियों में नहीं, बल्कि जनचेतना में बदलना होगा। स्कूल का विद्यार्थी नवाचार की शक्ति बने, किसान कृषि की नई तकनीक अपनाए, युवा कौशल और उद्यमिता की ओर बढ़े, वैज्ञानिक अनुसंधान को नई ऊंचाइयों तक ले जाएं, उद्योग रोजगार और उत्पादन बढ़ाएं और प्रत्येक नागरिक देश की सामूहिक शक्ति को समझने पर ही सप्तधारा वास्तविक राष्ट्रीय प्रवाह बनेगी।
2047 अभी दूर दिखाई देता है, लेकिन 2047 का भारत आज ही बनना शुरू हो चुका है। आज लिए गए निर्णय, आज की नीतियां, आज की शिक्षा, आज के कौशल, आज का नवाचार और आज की नागरिक चेतना ही उस भारत की नींव रखेंगे। इसलिए 15 अगस्त अब केवल एक तारीख नहीं है। यह आत्ममंथन का दिन है। यह संकल्प का दिन है। यह स्वतंत्रता की कीमत समझने का दिन है। और सबसे बढ़कर, यह भविष्य की जिम्मेदारी स्वीकार करने का दिन है।
भारत की सभ्यता ने हमेशा विविधता को विभाजन नहीं, बल्कि शक्ति माना है। सात स्वर अलग-अलग हैं, लेकिन संगीत एक है। सात रंग अलग-अलग हैं, लेकिन इंद्रधनुष एक है। सात कदम अलग-अलग हैं, लेकिन जीवन की यात्रा एक है। ठीक इसी तरह भारत की आर्थिक, तकनीकी, कृषि, औद्योगिक, रक्षा, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय शक्तियां अलग-अलग दिखाई देती हैं, लेकिन उनका लक्ष्य एक होना चाहिए- एक समृद्ध, सुरक्षित, सक्षम, आत्मनिर्भर और विकसित भारत। जब विनिर्माण की धारा कृषि की शक्ति से जुड़ेगी, कृषि तकनीक से जुड़ेगी, तकनीक गति शक्ति से जुड़ेगी, आर्थिक शक्ति रक्षा सामर्थ्य से जुड़ेगी, रक्षा और अर्थव्यवस्था के साथ भारत की सौम्य शक्ति विश्व में विश्वास पैदा करेगी और श्वेत-हरित-नील अर्थव्यवस्था विकास को टिकाऊ बनाएगी, तब इन सात धाराओं का मिलन एक विशाल राष्ट्रीय प्रवाह में होगा और यही वह प्रवाह होगा जो 2047 के भारत को केवल विकसित राष्ट्र नहीं, बल्कि विश्व को दिशा देने वाली सभ्यतागत शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।
स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में इसलिए हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि पिछले 79 वर्षों में भारत ने क्या हासिल किया। हमें यह भी पूछना चाहिए कि अगले 21 वर्षों में हम भारत को क्या बनाना चाहते हैं। क्योंकि इतिहास हमें विरासत देता है, लेकिन भविष्य हमें स्वयं बनाना होता है। सप्तधारा का संदेश स्पष्ट है कि शक्तियां अनेक हो सकती हैं, दिशाएं अनेक हो सकती हैं, लेकिन राष्ट्रीय लक्ष्य एक होना चाहिए और जब ये सात धाराएं एक साथ, एक लय में और एक दिशा में बहेगी, तभी 2047 में विकसित भारत का वह विराट प्रवाह दिखाई देगा, जिसकी कल्पना आज लाल किले की प्राचीर से की जा रही है। यह केवल स्वतंत्रता का उत्सव नहीं, राष्ट्र चैतन्यता का नया आरंभ है।
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