खून नहीं बहता है लेकिन फिर भी जीवन लहूलुहान होता है
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 08 अक्टूबर ::“नरसंहार” शब्द सुनते ही मन में भयावह दृश्य उभर आता है, बहता हुआ खून, बिखरी हुई लाशें, चीखते लोग और चारों ओर पसरा हुआ मातम। इतिहास में नरसंहार ने मानवता के सबसे क्रूर चेहरों को सामने रखा है। जातीय, नस्लीय, धार्मिक या राजनीतिक कारणों से बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या मानव सभ्यता के माथे पर ऐसे दाग हैं, जिन्हें समय भी पूरी तरह मिटा नहीं सका। लेकिन क्या नरसंहार का अर्थ केवल वही है, जिसमें गोलियां चले, तलवारें उठे और इंसानों की जान जाए? यह प्रश्न आज इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि आधुनिक समाज में शोषण के कुछ ऐसे रूप सामने आए हैं, जिनमें खून दिखाई नहीं देता है, लेकिन जीवन धीरे-धीरे निचुड़ता चला जाता है। बीमारी, बेरोजगारी, कर्ज, महंगाई, शिक्षा का महंगा होना, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच से बाहर होना, किसानों की आर्थिक विवशता, कानूनी प्रक्रिया की लंबाई और डिजिटल माध्यमों से होने वाला आर्थिक शोषण, ये सभी ऐसी स्थितियां पैदा कर सकते हैं, जिनमें व्यक्ति शारीरिक रूप से जीवित रहते हुए भी आर्थिक और मानसिक संकट से गुजरता है। इसी संदर्भ में जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों में भारी अंतर और हाल में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दवा की कीमतों के संदर्भ में इस्तेमाल किए गए कड़े शब्दों ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है।
सबसे पहले एक बात स्पष्ट होना जरूरी है। “नरसंहार” एक गंभीर कानूनी और अंतरराष्ट्रीय अपराध की अवधारणा है। सामान्य भाषा में इसका प्रयोग किसी बड़े पैमाने की हिंसक हत्या के लिए किया जाता है। इसलिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार या महंगाई से पैदा होने वाले संकट को कानूनी अर्थ में “नरसंहार” कहना उचित नहीं होगा। लेकिन सामाजिक विमर्श में “आर्थिक नरसंहार”, “सामाजिक नरसंहार” या “व्यवस्थागत शोषण” जैसे शब्द रूपक के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं। इनका उद्देश्य यह बताना होता है कि किसी व्यवस्था की ऐसी खामी, जो बड़ी संख्या में लोगों को लगातार नुकसान पहुंचाती है, वह भी मानव जीवन पर गंभीर असर डाल सकती है। यही वह बिंदु है जहां बहस रोचक भी बनती है और गंभीर भी। यदि किसी व्यक्ति के पास बीमारी का इलाज कराने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है, तो उसके सामने विकल्प क्या बचता है? इलाज कराए तो परिवार कर्ज में डूब सकता है और इलाज न कराए तो बीमारी जानलेवा हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति की स्वतंत्र पसंद वास्तव में कितनी स्वतंत्र है? यही प्रश्न स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा है।
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का नाम ही किसी परिवार के लिए चिंता का कारण बन जाता है। बीमारी के साथ उपचार का खर्च जुड़ता है और उपचार के साथ आर्थिक अनिश्चितता बनती है। कल्पना कीजिए कि किसी जीवनरक्षक दवा की कीमत एक स्तर पर 2,700 रुपये है, लेकिन अंतिम मरीज तक पहुंचते-पहुंचते वही दवा लगभग 27,000 रुपये में उपलब्ध होती है। कीमत में इतना बड़ा अंतर केवल एक परिवार की जेब पर असर नहीं डालता, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की पारदर्शिता, मूल्य निर्धारण और नियमन पर भी सवाल खड़े करता है। ऐसे मामलों में सबसे कमजोर व्यक्ति कौन होता है? मरीज। वह न दवा की कीमत तय करता है, न आपूर्ति श्रृंखला बनाता है, न कर संरचना निर्धारित करता है और न ही बाजार की शर्तें। उसके पास बीमारी होती है और इलाज की जरूरत। यही मजबूरी किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा है।
हाल में सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों में असाधारण अंतर से संबंधित मामले में “rampage and carnage” तथा “broad daylight dacoity” जैसे कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया है। न्यायालय की ऐसी टिप्पणी ने दवा मूल्य निर्धारण और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ की गंभीरता को सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इन शब्दों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि न्यायपालिका ने केवल तकनीकी मूल्य निर्धारण का प्रश्न नहीं देखा, बल्कि उसके सामाजिक प्रभाव की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। जब किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा व्यक्ति जीवन बचाने वाली दवा खरीदने के लिए बाजार जाता है, तब उसके पास सामान्य उपभोक्ता जैसी सौदेबाजी की क्षमता नहीं होती है। वह यह नहीं कह सकता कि कीमत ज्यादा है तो दवा नहीं खरीदेंगे। उसकी मजबूरी उसे खरीदने के लिए विवश करती है। यही स्वास्थ्य बाजार की सबसे संवेदनशील स्थिति है, जहां “मांग” और “मजबूरी” के बीच अंतर मिटने लगता है।
भारत में दवाओं की कीमतों के नियमन के लिए Drug Price Control Order यानि DPCO, 2013 महत्वपूर्ण व्यवस्था है। अनुसूचित दवाओं के मूल्य निर्धारण और बाजार में उनकी कीमतों पर नियंत्रण के लिए इसका ढांचा बनाया गया है। हालांकि दवाओं के हर वर्ग पर एक जैसा मूल्य नियंत्रण लागू नहीं होता। अलग-अलग दवाओं के लिए नियामकीय व्यवस्था और मूल्य निर्धारण की प्रकृति अलग हो सकती है। इसी संदर्भ में 16 प्रतिशत व्यापार मार्जिन का मुद्दा महत्वपूर्ण बनता है। कुछ आवश्यक दवाओं के लिए मूल्य निर्धारण व्यवस्था में खुदरा मार्जिन को लेकर नियमन मौजूद है। लेकिन यह मान लेना कि देश में बिकने वाली प्रत्येक दवा पर समान रूप से 16 प्रतिशत की सीमा लागू है, वास्तविक नियामकीय ढांचे को अत्यधिक सरल बना देना होगा। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 16 प्रतिशत मार्जिन मॉडल को व्यापक रूप से लागू करने की संभावना पर केंद्र सरकार से विचार करने को कहना महत्वपूर्ण है।
अब गेंद सरकार के पाले में है। दवा की अंतिम कीमत केवल निर्माता द्वारा तय कीमत से नहीं बनती। निर्माता से वितरक, वितरक से थोक विक्रेता और वहां से खुदरा विक्रेता तक पहुंचने के दौरान कई स्तर होते हैं। इसके अलावा पैकेजिंग, परिवहन, कर, व्यापारिक खर्च और अन्य लागतें भी होती है। लेकिन सवाल यह है कि इन सभी लागतों के बावजूद अंतिम कीमत और शुरुआती कीमत के बीच कितना अंतर उचित माना जा सकता है? यह प्रश्न केवल अर्थशास्त्र का नहीं है। यह मानवीय गरिमा का प्रश्न भी है। जब उत्पाद कोई विलासिता की वस्तु न होकर कैंसर की दवा हो, हृदय की दवा हो या किसी गंभीर बीमारी के उपचार का अनिवार्य हिस्सा हो, तब बाजार की सामान्य अवधारणाओं के साथ सामाजिक जिम्मेदारी का सिद्धांत भी जुड़ जाता है।
यहां सावधानी जरूरी है। यदि किसी वस्तु की कीमत अधिक है तो उसे तुरंत “नरसंहार” कहना उचित नहीं होगा। हर महंगी वस्तु शोषण का प्रमाण नहीं होती। उत्पादन लागत, अनुसंधान एवं विकास, पेटेंट, आयात, कर, आपूर्ति, गुणवत्ता नियंत्रण और वितरण जैसे कई कारण कीमत को प्रभावित करते हैं। इसी तरह दवा उद्योग भी केवल मुनाफे की कहानी नहीं है। नई दवाओं के विकास में लंबे समय तक अनुसंधान, परीक्षण और भारी निवेश होता है। कंपनियां जोखिम उठाती हैं और नई चिकित्सा तकनीक विकसित करती है। इसलिए समस्या का समाधान बाजार को पूरी तरह खारिज करने में नहीं है। समस्या वहां शुरू होती है जहां आवश्यक वस्तु की कीमत और वास्तविक लागत के बीच अंतर इतना बढ़ जाए कि मरीज के लिए उपचार लगभग असंभव हो जाए। यही नियमन की जरूरत पड़ती है।
सामान्य बाजार में ग्राहक के पास विकल्प होता है। एक दुकान महंगी है तो दूसरी दुकान पर जा सकते हैं। एक मोबाइल महंगा है तो दूसरा खरीद सकते हैं। एक कार महंगी है तो खरीदना टाल सकते हैं। लेकिन कैंसर की दवा के मामले में स्थिति अलग हो सकती है। डॉक्टर ने जो दवा लिखी है, उसके विकल्प सीमित हो सकते हैं। उपचार रोकना भी संभव नहीं होता। मरीज बीमारी से लड़ रहा होता है और परिवार आर्थिक दबाव से। इस स्थिति में बाजार की शक्ति एक तरफ और मरीज की मजबूरी दूसरी तरफ होती है। यहीं से “स्वास्थ्य न्याय” का प्रश्न पैदा होता है।
यदि किसी गरीब परिवार के बच्चे के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा लगातार महंगी होती जाए, तो वह अवसरों से वंचित हो सकता है। यदि इलाज महंगा हो जाए, तो परिवार अपनी बचत समाप्त कर सकता है। यदि रोजगार उपलब्ध न हो, तो युवा कर्ज में जा सकता है। यदि महंगाई लगातार बढ़े, तो आय और खर्च के बीच अंतर बढ़ सकता है। यदि किसान लागत और आय के बीच संतुलन न बना पाए, तो वह ऋण के दबाव में आ सकता है। यदि कानूनी प्रक्रिया अत्यधिक लंबी और महंगी हो, तो न्याय पाने की क्षमता आर्थिक स्थिति पर निर्भर होने लगती है और यदि डिजिटल दुनिया में उपभोक्ता को भ्रमित कर उससे छोटे-छोटे आर्थिक नुकसान लगातार किए जाएं, तो सामूहिक रूप से उसका प्रभाव बड़ा हो सकता है। इन सभी को कानूनी अर्थ में “नरसंहार” कहना सही नहीं होगा। लेकिन इन्हें व्यवस्थागत शोषण, आर्थिक असमानता या सामाजिक संकट के रूप में देखना निश्चित रूप से जरूरी है।
आज का आर्थिक शोषण कई बार दिखाई नहीं देता है। पहले शोषण का दृश्य स्पष्ट होता था, किसी से जबरन पैसा छीन लिया गया। आज शोषण का स्वरूप अधिक जटिल है। किसी सेवा की शर्तों में छिपा शुल्क, किसी डिजिटल लेनदेन में अनावश्यक कटौती, किसी ऋण का बढ़ता ब्याज, किसी अस्पताल का अस्पष्ट बिल, किसी दवा का अत्यधिक मूल्य या किसी आवश्यक सेवा की ऊंची कीमत, ये सब उपभोक्ता को धीरे-धीरे आर्थिक रूप से कमजोर कर सकते हैं। इसलिए आधुनिक समाज में शोषण को केवल हिंसा के पुराने पैमाने से नहीं समझा जा सकता है। लेकिन इसके लिए शब्दों का चयन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। “नरसंहार” शब्द की गंभीरता इतनी अधिक है कि उसका रूपक के रूप में इस्तेमाल करते समय स्पष्ट करना चाहिए कि यहां बात कानूनी नरसंहार की नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक पीड़ा के रूपक की हो रही है।
दवाओं के मामले में पहला सुधार पारदर्शिता हो सकता है। मरीज को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि वह जिस दवा के लिए हजारों रुपये चुका रहा है, उसकी अधिकतम खुदरा कीमत कैसे निर्धारित हुई। दवा की पैकिंग पर कीमत स्पष्ट हो। जेनेरिक विकल्प उपलब्ध हों तो डॉक्टर और मरीज को उनके बारे में पर्याप्त जानकारी मिले। अस्पताल में दवा की खरीद और मरीज से वसूली के बीच असामान्य अंतर हो तो उसकी जांच की व्यवस्था हो। जरूरी दवाओं के लिए मूल्य निगरानी मजबूत हो और सबसे महत्वपूर्ण, मरीज को उसकी मजबूरी के कारण आर्थिक रूप से असुरक्षित न बनाया जाए।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार से 16 प्रतिशत मार्जिन मॉडल को व्यापक रूप से लागू करने की संभावना पर विचार करने को कहना इसी बड़ी बहस का हिस्सा है। सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह एक ऐसा संतुलन बनाए जिसमें मरीज को उचित कीमत पर दवा मिले, लेकिन दवा उद्योग की उत्पादन, अनुसंधान और वितरण संबंधी वास्तविक लागतों की भी अनदेखी न हो। सिर्फ मार्जिन कम कर देना हर समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। जरूरत है पूरी आपूर्ति श्रृंखला की समीक्षा की। कहां कीमत बढ़ती है? किस स्तर पर कितना मार्जिन है? कौन-सी दवाएं वास्तव में आवश्यक हैं? कहां प्रतिस्पर्धा पर्याप्त है? कहां मरीज के पास विकल्प नहीं है? कहां नियमन की आवश्यकता है? इन प्रश्नों के जवाब के आधार पर नीति बननी चाहिए।
शायद इस शब्द का सबसे उपयोगी अर्थ यही हो सकता है कि समाज उन परिस्थितियों के प्रति चेतावधान हो, जिनमें आर्थिक व्यवस्था किसी व्यक्ति की जीवन रक्षा की क्षमता को कमजोर करने लगे। नरसंहार का वास्तविक अर्थ सामूहिक हत्या से जुड़ा है। लेकिन जब किसी परिवार की वर्षों की बचत एक बीमारी में समाप्त हो जाती है, जब इलाज के लिए जमीन बेचनी पड़ती है, जब कर्ज पीढ़ियों तक चलता है और जब आर्थिक असमर्थता उपचार तक पहुंच को निर्धारित करने लगे, तो उस पीड़ा को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता है। उसे क्या नाम दिया जाए- आर्थिक नरसंहार, आर्थिक शोषण, व्यवस्थागत अन्याय या स्वास्थ्य असमानता, इस पर बहस हो सकती है। लेकिन समस्या वास्तविक है तो उस पर बहस भी वास्तविक होनी चाहिए।
स्वास्थ्य व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य केवल दवा बेचना नहीं है। उसका उद्देश्य जीवन बचाना है। व्यापार आवश्यक है। उद्योग आवश्यक है। मुनाफा भी किसी उद्योग के टिके रहने के लिए आवश्यक हो सकता है। लेकिन जीवन रक्षक दवाओं के मामले में बाजार और मानवता के बीच संतुलन अनिवार्य है। किसी कैंसर मरीज के लिए दस हजार रुपये का अतिरिक्त बोझ किसी संपन्न व्यक्ति के लिए मामूली हो सकता है, लेकिन निम्न और मध्यम आय वाले परिवार के लिए वही रकम उपचार जारी रखने और उपचार रोक देने के बीच का अंतर बन सकती है। इसलिए दवा की कीमत का सवाल केवल रुपये-पैसे का सवाल नहीं है। यह सामाजिक न्याय का सवाल है।
“नरसंहार” एक ऐसा शब्द है जिसके साथ इतिहास की भयावह स्मृतियां जुड़ी हैं। इसलिए स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई या आर्थिक शोषण के संदर्भ में इसका प्रयोग कानूनी अर्थ में नहीं, बल्कि रूपक के तौर पर ही समझा जाना चाहिए। फिर भी यह प्रश्न गंभीर है कि क्या ऐसी व्यवस्था स्वीकार्य हो सकती है जिसमें जीवन बचाने वाली दवा की कीमत किसी मरीज की आर्थिक क्षमता से बाहर हो जाए? सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी ने इस प्रश्न को नई गंभीरता दी है। अब सरकार के सामने अवसर है कि वह दवा मूल्य निर्धारण की पूरी व्यवस्था की समीक्षा करे और यह सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए कि आवश्यक दवाएं मरीजों की पहुंच से बाहर न हो। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जहां मरीज बीमारी से लड़े, कीमत से नहीं। जहां दवा बाजार का उत्पाद होने के साथ-साथ जीवन रक्षा का साधन भी मानी जाए। जहां मुनाफा हो, लेकिन मजबूरी का फायदा न उठे। जहां नियमन हो, लेकिन नवाचार बाधित न हो और जहां किसी परिवार को यह फैसला न करना पड़े कि दवा खरीदें या घर चलाएं। क्योंकि आधुनिक सभ्यता की असली परीक्षा यही है, हमने इंसान को कितनी लंबी जिन्दगी दी, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि उस जिन्दगी को बचाने के लिए जरूरी साधन उसकी पहुंच में कितने हैं। खून बहने पर समाज तुरंत जाग जाता है। चुनौती यह है कि जहां खून दिखाई नहीं देता, वहां भी पीड़ा को पहचाना जाए। यही शायद इस पूरे विमर्श का सबसे बड़ा संदेश है।