अपने समय के सूर्य हैं राष्ट्रकवि दिनकर: प्रो. तरुण कुमार/ टी.पी.एस. कॉलेज, पटना के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित रामधारी सिंह दिनकर जयंती समारोह
पटना ब्यूरो, 23 सितंबर 2025: टी.पी.एस. कॉलेज, पटना के हिंदी विभाग द्वारा राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 117वीं जयंती के अवसर पर एक भव्य समारोह का आयोजन कौटिल्य सभागार में किया गया। इस समारोह का शीर्षक था “आजाद भारत और कवि दिनकर”। कार्यक्रम में दिनकर की साहित्यिक उपलब्धियों, उनके काव्य और गद्य लेखन के साथ-साथ उनकी राष्ट्रीय भावना को रेखांकित किया गया।
मुख्य अतिथि प्रो. तरुण कुमार (पूर्व विभागाध्यक्ष, पटना विश्वविद्यालय) ने अपने संबोधन में कहा, “रामधारी सिंह दिनकर अपने समय के सूर्य हैं। उनकी कविताएँ न केवल साहित्यिक उत्कृष्टता का प्रतीक हैं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम और आजाद भारत की भावनाओं का जीवंत दस्तावेज हैं। उनकी रचनाएँ जन-जन की आवाज बनकर उभरीं और आज भी प्रासंगिक हैं।”
मुख्य अतिथि प्रो. श्यामल किशोर (प्राचार्य, रामेश्वर कॉलेज, मुजफ्फरपुर) ने अपने संबोधन में कहा, “दिनकर की कविताएँ भारतीय समाज के लिए एक प्रेरणास्रोत रही हैं। उनकी रचनाएँ न केवल साहित्यिक बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चेतना को भी जागृत करती हैं। उनकी कविता ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ आज भी जन आंदोलनों की प्रेरणा है और युवा पीढ़ी को राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाती है।”
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. रूपम ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा, “रामधारी सिंह दिनकर न केवल एक कवि थे, बल्कि एक युगदृष्टा थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को जागृत किया। उनकी कविताएँ आज भी हमें स्वतंत्रता, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम की प्रेरणा देती हैं। यह समारोह उनकी साहित्यिक और सामाजिक विरासत को जीवित रखने का एक प्रयास है।”
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अश्विनी कुमार ने किया, जबकि डॉ. ओंकार पासवान कार्यक्रम के सचिव थे। समारोह की शुरुआत 1975 में दिनकर द्वारा लंदन में कवि सम्मेलन में प्रस्तुत कविता “नील कुसुम” को उनके ही स्वर में सुनाकर की गई। इसके पश्चात डॉ. ओंकार पासवान ने दिनकर की प्रसिद्ध कविता “रश्मिरथी” के अंश को संगीतमय काव्य पाठ के रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें पंक्ति “जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है” ने श्रोताओं का ध्यान आकर्षित किया।
स्वागत भाषण डॉ. शशि भूषण चौधरी ने दिया। उन्होंने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि दिनकर को जनता ने उनकी रचनाओं में व्यक्त जन भावनाओं के कारण “राष्ट्रकवि” की उपाधि दी। उनकी कविताएँ जनता की आवाज को प्रतिबिंबित करती हैं। उन्होंने बताया कि दिनकर ने प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन पर अत्यधिक धन खर्च पर नाराजगी जताते हुए “हाय दिल्ली” कविता लिखी थी। साथ ही, भारत-चीन युद्ध के दौरान “उद्घोषक” कविता के माध्यम से जनता में राष्ट्रवाद की भावना जगाने का कार्य किया। उनकी गद्य रचना “संस्कृति के चार अध्याय” भी उनकी साहित्यिक प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
प्रो. जावेद अख्तर खान ने अपने संबोधन में कहा कि दिनकर की पंक्तियाँ, जैसे “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है”, जन आंदोलनों का नारा बन चुकी हैं। उन्होंने दिनकर की कविता “जो तटस्थ समय लिखेगा, उनका भी इतिहास” को अपनी पसंदीदा रचना बताया। डॉ. अश्विनी कुमार ने दिनकर की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए उनके साहित्यिक योगदान को रेखांकित किया।
कार्यक्रम में अन्य गणमान्य व्यक्तियों में प्रो. नवेंदु शेखर, प्रो विजय कुमार सिन्हा,प्रो. कृष्ण नंदन प्रसाद, डॉ. प्रशांत कुमार, डॉ. सनंदा सिन्हा, डॉ. विनय भूषण कुमार, प्रो. अंजलि प्रसाद, डॉ. प्रीति कुमारी, डॉ. अमृतांशु कुमार, डॉ. उदयन, डॉ. उषा किरण, डॉ. नूतन कुमारी, डॉ. दीपिका शर्मा, डॉ. ओंकार पासवान, डॉ. सुशोभन पालधी, डॉ. मुकुंद कुमार, डॉ. शशि शेखर सिंह, डॉ. देबरती घोष, डॉ. मनीष कुमार, और पूजा कुमारी ने समारोह की शोभा बढ़ाई।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. ओंकार पासवान ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापित किया। यह समारोह दिनकर के साहित्य और उनके राष्ट्रवादी विचारों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक सफल प्रयास रहा।