साहित्य सम्मेलन में आयोजित हुई काव्य-कार्यशाला, सिखायी ‘कविताई’, पढ़ाया छंद का पाठ
पटना, 6 सितम्बर। ‘छंद’ कविता का प्राण-तत्त्व है। यह काव्य को अनुशासित, सरस और दीर्घायु बनाता है। छंद के कवियों ने ही अमरत्व प्राप्त किए। क्योंकि छंदोबद्ध रचनाएँ गेय और इसीलिए चिर स्मरणीय होती हैं। हमारा प्राच्य साहित्य इसीलिए बचा रहा, क्योंकि वे छंदो-बद्ध थे, गेय थे। अन्यथा वेद, पुराणादि जीवित नही होते।
यह बातें, रविवार को, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी-पखवारा और पुस्तक-चौदस मेला के ६ठे दिन आयोजित ‘काव्य-कार्यशाला’ की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने पद्य के विभिन्न रूपों और विधाओं के विषय में विस्तृत चर्चा के साथ उसकी रचना-प्रक्रिया, मात्रा की गणना और छंद-विधान से प्रतिभागियों को सोदाहरण अवगत कराया।
छंद के चर्चित कवि आचार्य विजय गुंजन ने दोहा, सोरठा, रोला, कुंडलियाँ, सवैया, कवित्त आदि छंदों की रचना सोदाहरण समझाते हुए, कहा कि कविता में गति (प्रवाह) और यति (विराम) का होना अनिवार्य है।
पं रामरक्षा मिश्र ‘विमल’ और सम्मेलन के साहित्य मंत्री भगवती प्रसाद द्विवेदी ने भी आचार्य के रूप में विविध छंदों का सोदाहरण प्रशिक्षण दिया।
कार्यशाला के प्रतिभागियों में,कवयित्री आराधना प्रसाद, विभा रानी श्रीवास्तव, डा शशि भूषण सिंह, डा विद्या चौधरी, ईं अशोक कुमार, डा प्रतिभा रानी, डा पूनम देवा, डा रेणु मिश्र, डा नागेश्वर यादव, सिद्धेश्वर, इन्दु भूषण सहाय, पं उमेश मिश्र, अनुभा गुप्ता, सुधा पाण्डेय, कृष्ण रंजन सिंह, चंदा मिश्र, अभिराम बुद्धवाहा, डा कुंदन लोहानी, डा पंकज प्रियम, प्रवीर कुमार पंकज, राज प्रिया रानी, शंभुनाथ पाण्डेय, शीला कुमारी, शुभाषिणी कुमारी, नागेंद्र राय, वर्षा कुमारी, पंकज कुमार झा, प्रणय कुमार, आदित्य कुमार, ईशा कुमारी, मुकेश कुमार समेत अनेक साहित्यकार और नवोदित कवि सम्मिलित थे।