Kaushlendra Pandey/हिंदी विभाग की ओर से आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता पटना विश्वविद्यालय के हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो.तरूण कुमार ने कहा कि हिंदी आसानी से राजभाषा नहीं बनी। हिंदी को राजभाषा बनाया जाए या नहीं, इस पर चार दिनों तक धुंआधार संविधान सभा में चर्चा हुई। कुछ लोगों का कहना संस्कृत को राजभाषा बनाया जाए तो कुछ का उर्दू, तो कुछ ने बंगला को राजभाषा बनाये जाने की बात की। हिंदी भाषा के लोगों का यह दायित्व बनता है कि गैर हिंदी भाषी से अपने को जोड़ कर उनलोगों के मन में हिंदी के लिए प्रेम पैदा करें। इसलिए हमलोगों की यह जिम्मेदारी है कि हिंदी के अलावा कम से कम एक भारतीय भाषा मन के अनुकूल सीखने की कोशिश करें।

उन्होंने संगोष्ठी में छात्रों से शब्दकोश बढ़ाने की बात कही। उन्होंने कहा भाषा पहले विचार किये जाने का माध्यम है ततपश्चात अभिव्यक्ति का। साथ ही उन्होंने शिक्षकों से कहा कि आप किसी भी विषय के हों पर आपको एक ऐसी भाषा पर पकड़ बनानी होगी जिसके माध्यम से आप आसानी से बोल सके, क्योंकि भाषा हमारे अस्तित्व और विचार से जुड़ा है। विश्व में हिंदी का फैलाव हुआ और हो रहा है, आगे भी होगा। उसके तीन बड़े कारण है। भारतीय मूल निवासियों की अच्छी संख्या कमाने के विदेश गए। ये गिरमिटिया मजदूर कहलाते थे। जिन देशों में इनकी संख्या ज्यादा रही वहां हिंदी सहज रूप से बोला जाने लगा। हिंदी को वैश्विक रूप देने में सबसे पहले गिरमिटिया लोगों का योगदान है। उन्होंने कहा कि ऑक्सफोर्ड डिक्सनरी में लगभग 3 हजार ऐसे शब्द है जो हिंदी के हैं। मुख्य अतिथि प्रो. रामप्रवेश सिंह ने कहा कि रामेश्वर कॉलेज चेतना के केंद्र में स्थित है। शिक्षा का अर्थ आत्मीयता है। दूसरे को जोड़ते कैसे हैं, दूसरे को बढ़ाते कैसे हैं। छात्रों के अंदर संस्कार और जिज्ञासा भरना है। बाजारवाद से बचकर रहना है। वैभव होने से आदमी विद्वान नहीं होता, विद्वान विद्या और प्रेम से होता है। उन्होंने कहा वैश्विक फलक पर हिंदी शान से खड़ी है। यह संवाद के साथ जागरूक और पर्यटन के माध्यम से है। भाषा का प्रभाव चेतना पर पड़ती है तो यह प्रभाशाली हो जाती है। साहित्य में भावना ही सबकुछ होती है। उन्होंने कहा हिंदी का भविष्य उज्जवल है। विजन हो तो भाषा की दीवार टूट जाती है। अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य प्रो. श्यामल किशोर ने कहा कि जहां ज्ञान होगा वहां स्वीकृति होगी। जहां अज्ञान होगा वहां अहंकार होगा। किसी भी शैक्षणिक संस्थान का माहौल तभी अच्छा बना सकते हैं जब दूसरों की बातों को सुने और दूसरे की बातों का सम्मान करें। आप दूसरे के प्रति वही व्यहवार करें जिसकी आप खुद अपेक्षा करते हैं। प्राचार्य ने कहा कि क्षेत्रीय भाषा समृद्ध होगा तो मातृ भाषा भी समृद्ध होगा। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषा पर बहुत बल दिया गया है। हिंदी दिवस मनाते हैं तो हमें जरूर सोचना चाहिए कि हमने हिंदी के लिए क्या किया है। हिंदी में बच्चों की संख्या बहुत बढ़ी है। इसके पीछे वैश्विक स्तर पर रोजगार परक शिक्षा भी बड़ा कारण हो सकता है। मंच संचालन डॉ.उपेंद्र प्रसाद व स्वागत डॉ.अभिनय कुमार ने किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रो.ब्रह्मचारी व्यास नंदन शास्त्री ने किया। छात्रों ने हिंदी और देश भक्ति पर आधारित नाटक प्रस्तुत किया। साथ ही छात्रों को सम्मानित किया गया।




























