पटना, 6जून। हिन्दी अवश्य ही देश की राष्ट्राभाषा बनेगी। इसे देश की राष्ट्राभाषा बनने से कोई रोक नहीं सकता। साहित्य सम्मेलन जो आंदोलान चला रहा है, उसे बल दिया जाना चाहिए। उसी तरह याचिका संख्या-435 / 15 में पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अमरेश्वर प्रताप सिंह, न्यायमूर्त्ति आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद की तीन सदस्यीय पूर्ण पीठ द्वारा, दिनांक 30 अप्रैल, 2019को पारित न्यायिक आदेश का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यह न्यायिक-आदेश उच्च न्यायालय में हिन्दी के प्रयोग को सुनिश्चित करता है। यह आदेश भारत के संविधान के अनुच्छेद-348 के खंड-2 और राजभाषा अधिनियम-1963की धारा -7 के अधीन प्रदत्त शक्तियों के आधार पर बिहार के राज्यपाल द्वारा 9 मई, 1972की अधिसूचना के आलोक में पारित किया गया था।
बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, अखिल भारतीय अधिवक्ता कल्याण समिति, बिहार के तत्त्वावधान में आयोजित राज्य स्तरीय सम्मेलन और संगोष्ठी उद्घाटन करते हुए बिहार विधान सभा के अध्यक्ष प्रेम कुमार ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारतीय लोकतंत्र में अधिवक्ता समाज की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। स्वतंत्रता आंदोलन में भी अधिवक्ताओं की बड़ी भूमिका रही है। देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, बाबसाहेब भीम राव अम्बेडकर अधिवक्ता ही थे। न्यायव्यवस्था में अधिवक्ता समाज अभिन्न अंग है। इनका कल्याण आवश्यक है। विधान सभा के अध्यक्ष ने इस अवसर पर सत्यप्रकाश तिवारी की पुस्तक ‘मोमवत्ती से मशाल तक’ का लोकार्पण भी किया।
संगोष्ठी के मुख्यवक्ता और साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि राजभवन ने संविधान-प्रदत्त अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए जो अधिसूचना वर्ष 1972में निर्गत की उसके अनुपालन के प्रसंग में उच्चन्यायालय में न्यायिक-आदेश देने में 47वर्ष लगे और उसके बाद भी उसका सम्यक् अनुपालन नहीं होना अत्यंत चिंता का विषय है। इसका शीघ्र अनुपालन तो होना चाहिए। किंतु, हिन्दी से संबंधित इस या ऐसे सभी प्रश्नों का उत्तर केवल इस निर्णय में है कि भारत अपनी ‘राष्ट्र-भाषा’ घोषित करे, जो हिन्दी हो और उसकी लिपि देवनागरी हो। हिन्दी को लेकर अभी तक भारतवर्ष में जो अनिश्चय और द्विविधा है, उनका समाधान केवल यही है।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता धर्मनाथ प्रसाद यादव ने कहा कि जबतक जनता की भाषा में न्याय की व्यवस्था नहीं होती, भारत के लोगों को उचित न्याय नहीं मिल सकता। आज समाज का विश्वास केवल न्यायपालिका पर बचा रह गया है। यदि न्यायपालिका से भी आमजन का विश्वास टूट गया तो देश में घोर अराजकता आ जाएगी। हमें हिन्दी को इतना बल देना है कि वह भारत की शीघ्र ही राष्ट्र-भाषा बने। न्यायपालिका की भाषा तो अविलम्ब बने।
पूर्व ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश दामोदर प्रसाद, न्यायालयों में हिन्दी के लिए संघर्षरत अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद, बिहार भूमि न्यायाधिकरण के सदस्य रवींद्र राय, समिति के राष्ट्रीय महामंत्री सत्य प्रकाश तिवारी, प्रदेश अध्यक्ष रणविजय सिंह, प्रदेश महामंत्री डा मधु सूदन राय, युवा कोषांग के अध्यक्ष अधिवक्ता पंकज कुमार, डा अमित पासवान, आशुतोष कुमार, शिवानन्द गिरि, संजीव मिश्र, आदि अधिवक्ताओं और विद्वानों ने अपने विचार रखे।
इस अवसर पर समिति की ओर से ५० वर्षों से अधिक समय से वकालत करने वाले अधिवक्ताओं सर्वेश नारायण सिंह, विन्धय केशरी कुमार, डा उमाशंकर प्रसाद, उपेंद्र प्रसाद, नवल किशोर प्रसाद सिंह, गोपाल कृष्ण अग्रवाल, गजेंद्र प्रसाद सिंह, आशुतोष कुमार, राम प्रवेश, ब्रज किशोर प्रसाद, राम विनय शर्मा, सुरेश प्रसाद निराला, रामचंद्र सिंह, नित्यानंद तिवारी, लक्ष्मी नारायण राय, परशुराम चौधरी, राम कृष्ण गिरि, नागेंद्र प्रसाद सिंह तथा धर्मनाथ प्रसाद यादव को ‘अधिवक्ता-रत्न’ सम्मान से विभूषित किया।
धन्यवाद-ज्ञापन डा ओम् प्रकाश जमुआर ने तथा मंच का संचालन न्यायार्थी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष पृथ्वीराज यदुवंशी ने किया। समारोह में सैकड़ों की संख्या में विद्वान अधिवक्ता और समिति के सदस्यगण उपस्थित थे।




























