Kaushlendra Pandey / धर्मेंद्र प्रधान की मौजूदगी में ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों को मिली मंजूरी, छात्रों को देश में ही मिलेगी विश्वस्तरीय शिक्षा.
भारत को वैश्विक शिक्षा केंद्र बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan की मौजूदगी में ब्रिटेन के University of Bristol, University of York और ऑस्ट्रेलिया के University of New South Wales को भारत में अपने कैंपस स्थापित करने के लिए स्वीकृति पत्र सौंपे गए। इसके साथ ही मुंबई और बेंगलुरु अंतरराष्ट्रीय शिक्षा एवं नवाचार के नए केंद्र के रूप में उभरने की ओर बढ़ गए हैं।
केंद्र सरकार का मानना है कि विदेशी विश्वविद्यालयों की मौजूदगी से भारतीय छात्रों को विश्वस्तरीय शिक्षा के लिए विदेश जाने की आवश्यकता कम होगी और उन्हें अपने देश में ही वैश्विक स्तर की पढ़ाई तथा शोध के अवसर मिलेंगे। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के उस लक्ष्य को आगे बढ़ाती है, जिसके तहत भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने की परिकल्पना की गई है।
ब्रिस्टल विश्वविद्यालय मुंबई में अपना “मुंबई एंटरप्राइज कैंपस” स्थापित करेगा। यहां इमर्सिव आर्ट्स, फाइनेंस, डेटा साइंस, अर्थशास्त्र, बिजनेस मैनेजमेंट, एंटरप्रेन्योरशिप और इनोवेशन जैसे आधुनिक विषयों में पढ़ाई कराई जाएगी। वहीं यॉर्क विश्वविद्यालय भी मुंबई में अपना कैंपस शुरू करेगा, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी, कंप्यूटर साइंस, बिजनेस और क्रिएटिव इंडस्ट्रीज से जुड़े कोर्स संचालित होंगे।
ऑस्ट्रेलिया का यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स बेंगलुरु में अपना कैंपस स्थापित करेगा। यह संस्थान बिजनेस, कंप्यूटर साइंस और साइबर सिक्योरिटी के अलावा नवीकरणीय ऊर्जा, स्वास्थ्य, परिवहन और शिक्षा के क्षेत्र में शोध एवं नवाचार को बढ़ावा देगा। बेंगलुरु पहले से ही देश की टेक्नोलॉजी राजधानी माना जाता है और विदेशी विश्वविद्यालय की एंट्री से यहां वैश्विक शैक्षणिक सहयोग को नई गति मिलने की उम्मीद है।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों का भारत आना इस बात का प्रमाण है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर वैश्विक संस्थानों का भरोसा लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि इससे छात्रों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा, अत्याधुनिक शोध सुविधाएं और रोजगार के बेहतर अवसर प्राप्त होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस खुलने से भारत उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक नई पहचान बना सकता है। इससे विदेशी निवेश बढ़ेगा, अकादमिक सहयोग मजबूत होगा और भारत के लाखों छात्रों को वैश्विक गुणवत्ता की शिक्षा अपने देश में ही उपलब्ध हो सकेगी।




























