“प्रेमचंद, टंडन और आचार्य विश्वनाथ को श्रद्धांजलि… साहित्य सम्मेलन में गूंजे ऐसे विचार, सुनकर रह जाएंगे भावुक”
पटना, १ अगस्त। कथा-साहित्य को मुंशी प्रेमचंद्र ने जनोन्मुख किया। उन्होंने भारत के लोक-जीवन और उनकी समस्याओं का नब्ज पकड़ा था। उनकी कहानियाँ, भारत के आमलोगों की कहानियाँ हैं। उनमें किसान, मज़दूर और ग़रीबों की पीड़ा और प्रतिकार के स्वर हैं। वे मानव-मन की मूल-ग्रंथियों को स्पर्श करते हैं, इसलिए वे हर काल में प्रासंगिक हैं।
यह बातें शनिवार को, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती समारोह और लघुकथा-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए,सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि, अखिल भारतवर्षीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संस्थापक-प्रधानमंत्री राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन हिन्दी-आंदोलन के प्रणेता थे। राष्ट्र और राष्ट्रभाषा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले इस ऋषि-तुल्य मनीषी ने हिन्दी के लिए नेहरु से भी लड़ने में संकोच नही किया। वहीं आचार्य विश्वनाथ सिंह एक ऐसे मनीषी विद्वान थे, जिनसे समाज प्रेरणा ग्रहण करता है।
राँची विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे डा जे बी पाण्डेय ने आचार्य विश्वनाथ सिंह को स्मरण करते हुए कहा कि आचार्य जी एक महान शिक्षक ही नहीं, बहुभाषा-विद भाषा-वैज्ञानिक और शिक्षाविद थे। उन्होंने गया के अनुग्रह नारायण महाविद्यालय सहित तीन महाविद्यालयों की स्थापना की थी। वे एक परोपकारी और कल्याणकारी महापुरुष थे। उन्होंने अनेक विपन्न विद्यार्थियों को आगे पढ़ने में सहायता की।
गया के वरिष्ठ हिन्दी-सेवी डा कृष्ण देव मिश्र ने कहा कि आचार्य जी अद्भुत प्रतिभा के शिक्षक थे। जिस विषय को पढ़ा दिया, उसे फिर से देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।
मगध विश्वविद्यालय के पूर्व संकायाध्यक्ष डा शैलेन्द्र कुमार चौधरी, अनुग्रह नारायण महाविद्यालय, गया के परीक्षा नियंत्रक डा उमा शंकर सिंह, डा रत्नेश्वर सिंह, डा ध्रुव कुमार तथा प्रो सुनील कुमार उपाध्याय ने भी अपने विचार व्यक्त किए। लोकप्रिय गीतकार ब्रह्मानन्द पाण्डेय को भी उनके जन्म-दिवस पर अंग-वस्त्रम और पुष्प-गुच्छ देकर सम्मनित किया गया तथा पत्रिका ‘ईक्षा’ के २२ वें अंक का लोकार्पण किया गया।
इस अवसर पर आयोजित लघुकथा-गोष्ठी में, डा पुष्पा जमुआर ने ‘पृथा’, डा पूनम आनन्द ने ‘सीख’, विभारानी श्रीवास्तव ने ‘मृग-तृष्णा’,सिद्धेश्वर ने ‘स्वीच ऑफ’, सुमेधा पाठक ने ‘रेत पर बूँद’, डा ऋचा वर्मा ने ‘छात्र आंदोलन’, कुमार अनुपम ने ‘कुफ़्र टूटा’, ईं अशोक कुमार ने ‘आपदा में अवसर’, रवि रौशन आनन्द ने ‘इंसान’, रंजन कुमार अमृतनिधि ने ‘भूखी बच्ची’, नन्दन कुमार ने ‘साइकिल-रेस’ तथा इन्दुभूषण सहाय ने ‘शब्द-समय-संबंध’ शीर्षक से अपनी लघुकथा पढ़ी। अतिथियों का स्वागत आचार्य विश्वनाथ सिंह की विदुषी पुत्री प्रो उषा सिंह ने,धन्यवाद-ज्ञापन कृष्णरंजन सिंह ने तथा मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने किया।
चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से आरंभ हुए इस समारोह में, व्यंग्यकार बाँके बिहारी साव, डा ब्रजभूषण शर्मा, डा अर्चना त्रिपाठी, शम्भु अमिताभ, कमल नयन श्रीवास्तव, प्रवीर कुमार पंकज, रौली कुमारी, डा मीनाक्षी गुप्ता, अनन्या सिंह, श्याम मनोहर मिश्र, डा राम राज्य शर्मा, डा कुंदन लोहानी, डा सीमा कुमारी, डा शालिनी कुमारी आदि अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित थे।