साहित्य सम्मेलन में मनायी गयी नेपाली और हंस कुमार तिवारी जयंती, स्मरण किए गए पीर मूनिस
पटना, १२ अगस्त। गीत, नेपाली की लेखनी में ही नही उसके देह में विचरण करने वाले प्राण और प्राण-वाहिका धमनियों में समाए हुए थे। उनके रक्त-रक्त, मज्जे-मज्जे और रोम-कूपों से भी गीत फूटते थे। वह साँस भी भरे तो छंद निकल पड़ता था। आह निकले तो उसके साथ ऐसे मर्म-स्पर्शी गीत बह निकलते थे, जिन्हें सुन कर लाखों हृदय तड़प उठते थे। जब २१ वर्ष की आयु में नेपाली ने पहलीबार काशी में आयोजित एक अखिल भारतीय कवि-सम्मेलन में अपना काव्य-पाठ किया, तो सभी बड़े कवि ही नहीं, आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी भी चकित रह गए। उन्होंने प्रशंसा के स्वर में यह पूछा – ‘क्या तुम कविताई अपनी माँ के पेट से सीख कर आए हो?’ यह कवि-सम्मेलन, वर्ष १९३२ में वाराणसी की काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा ‘द्विवेदी अभिनन्दन समारोह’ के अंतर्गत आयोजित हुआ था।
यह बातें बुधवार को, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में गीतों के राजकुमार गोपाल सिंह नेपाली और अनुवाद साहित्य के महान साहित्यकार पं हंस कुमार तिवारी की जयंती पर आयोजित कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि नेपाली, प्रेम, प्रकृति, राष्ट्रीय चेतना और दर्शन के सबसे लोकप्रिय गीतकार थे। देश के केवल तीन कवि, दिनकर, बच्चन और जानकी वल्लभ शास्त्री ही थे जो, मंचों पर उनसे स्पर्द्धा कर सकते थे। चीनी आक्रमण के समय लिखी गयी उनकी रचना ‘हिमालय ने पुकारा’, न केवल भारत के नौजवानों में उत्साह का सृजन किया, अपितु भारतीय सेना को भी बल प्रदान किया। भारतीय सीमाओं पर जाकर उन्होंने सेना का उत्साह बढ़ाया। चीन की सरकार जितनी भारतीय सेना से नहीं डरती, जितनी की नेपाली से। इसीलिए नेपाली को ‘वन मैन आर्मी’ कहा जाने लगा था। हिन्दी साहित्य में वे एक अनूठे गीतकार थे। समय ने उन्हें समय नहीं दिया, अन्यथा में गीत-सम्राट कहे जाते।
डा सुलभ ने उत्तर छायावाद के एक अन्य महत्त्वपूर्ण कवि पं हंस कुमार तिवारी को स्मरण करते हुए कहा कि ये तिवारी जी ही थे, जिन्होंने’अनुवाद’ विधा को हिन्दी साहित्य में मान्यता दिलायी। उन्होंने बांगला साहित्य का हिन्दी में प्रचूर अनुवाद किया। डा सुलभ ने सम्मेलन के संस्थापकों में से एक और सम्मेलन के अध्यक्ष रहे चंपारण-सत्याग्रही पीर मुहम्मद मूनिस को भी उनकी स्मृति दिवस पर याद किया।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरम्भ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। वरिष्ठ कवि डा रत्नेश्वर सिंह, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, विपिन विप्लवी, डा पल्लवी विश्वास, शमा कौसर ‘शमा’, सदानन्द प्रसाद, सूर्य प्रकाश उपाध्याय, सुनीता रंजन, कमल नयन श्रीवास्तव, इन्दु भूषण सहाय, इरफ़ान अहमद बेलहरवी, नन्दन कुमार, अश्विनी कविराज, आदित्य कुमार आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी सरस-सुमधुर रचनाओं से काव्यांजलि अर्पित की। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्णरंजन सिंह ने किया।
इल्मी मजलिस के महासचिव परवेज़ आलम, प्रवीर कुमार पंकज, रवि आनन्द, प्रेम अग्रवाल, रंजन कुमार प्रतिनिधि, मो फ़हीम, आनन्द दीप चौबे, नरेश कुमार, रोज़ी परवीन, नन्दन कुमार मीत, प्रेम प्रकाश आदि प्रबुद्धजन समारोह में उपस्थित थे।