रक्षा सूत्र में बंधा स्नेह, आशीर्वाद और रिश्तों का अटूट विश्वास
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 28 अगस्त, 2026 :: रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का त्योहार नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति में स्नेह, विश्वास, सुरक्षा और कर्तव्य की भावना का प्रतीक भी है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व को स्थानीय परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। मूल भावना एक ही है कि रक्षा करने वाले के प्रति प्रेम और आभार व्यक्त करना। वर्तमान समय में राखी भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की पहचान बन चुकी है। बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उसके सुखी, स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की कामना करती है, जबकि भाई बहन की रक्षा का संकल्प लेता है।
राजधानी पटना में रक्षाबंधन का पर्व उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। घरों और अपार्टमेंट परिसरों में बहनों ने भाइयों की कलाई पर राखी बांधी और उनके सुख-समृद्धि की कामना की। इस दौरान कई ऐसे दृश्य भी देखने को मिले, जहां उम्र की सीमाएं छोटी पड़ गईं और राखी का धागा रिश्तों की आत्मीयता का प्रतीक बन गया।
आशियाना-दीघा रोड स्थित विशाल आदित्य अपार्टमेंट में रक्षाबंधन का बेहद भावुक दृश्य देखने को मिला। कम उम्र के अनंत कुमार सिन्हा को उसकी मात्र दो माह की बहन अनविका सिन्हा उर्फ आर्या ने अपने जीवन के पहले रक्षाबंधन पर चांदी का रक्षा सूत्र बांधा। नन्हीं बहन के हाथों भाई की कलाई पर बंधा यह रक्षा सूत्र पूरे परिवार के लिए विशेष खुशी का अवसर बना। परिवार के लोगों ने इस पल को स्नेह और आशीर्वाद से भर दिया।
गोला रोड स्थित सर्वोदय नगर में भी रक्षाबंधन का भावनात्मक रूप देखने को मिला। वयोवृद्ध राजमणि सिन्हा ने अपने चचेरे भाई पत्रकार-लेखक जितेन्द्र कुमार सिन्हा को रक्षा सूत्र बांधकर उनके दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना की। उम्र के इस पड़ाव पर भी भाई-बहन के रिश्ते में मौजूद आत्मीयता ने यह संदेश दिया कि स्नेह के रिश्तों की कोई उम्र नहीं होती है। इसी तरह सगुना मोड़ स्थित साईं आरकेएम अपार्टमेंट में अनुश्री सिन्हा उर्फ आशी और श्रीजा सिन्हा उर्फ नव्या ने अपने छोटे भाई वायु की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उसके दीर्घायु जीवन का आशीर्वाद दिया। एजी कॉलोनी निवासी यशस्वी कुमार ने अपनी छोटी ममेरी बहन आर्या से रक्षा सूत्र बंधवाकर उसे स्नेह और आशीर्वाद दिया। वहीं बंगलुरू निवासी ऋषिभ को भी अनविका सिन्हा ने रक्षा सूत्र बांधा। दूरियां भले ही अलग-अलग शहरों और मुहल्लों की थी, लेकिन रक्षा सूत्र ने रिश्तों को भावनात्मक रूप से एक सूत्र में बांध दिया।
रक्षाबंधन का अर्थ केवल भाई की कलाई पर बहन द्वारा राखी बांधना नहीं है। भारतीय परंपरा में रक्षा सूत्र को सुरक्षा, विश्वास और शुभकामना का प्रतीक माना गया है। इसी कारण प्राचीन समय में गुरु, पुरोहित, राजा और समाज के अन्य सम्मानित व्यक्तियों को भी रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा रही है। इसका मूल संदेश है कि जिसके प्रति सम्मान और विश्वास हो, उसके मंगल और रक्षा की कामना करना।
रक्षाबंधन से जुड़ी अनेक पौराणिक मान्यताएं भारतीय संस्कृति में प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा था। इसी प्रकार इंद्राणी द्वारा देवराज इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने की कथा भी प्रसिद्ध है। उस समय रक्षा सूत्र को शक्ति और विजय का प्रतीक माना गया था। इंद्राणी द्वारा बांधे गए येनरक्षा सूत्र से जुड़ा मंत्र आज भी रक्षाबंधन की धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण माना जाता है-
“ बद्धो बलिः राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।“
इस मंत्र में रक्षा सूत्र की स्थिरता और सुरक्षा की भावना निहित है।
रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग भी आता है। मान्यता है कि शिशुपाल के वध के दौरान श्रीकृष्ण की तर्जनी में चोट लग गई थी। रक्त बहता देखकर द्रौपदी ने तत्काल अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया। यह घटना भाई-बहन के पारंपरिक रिश्ते से अलग होते हुए भी प्रेम, अपनत्व और रक्षा की भावना का प्रतीक मानी जाती है। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के इस स्नेह को सदैव याद रखा और संकट के समय उनकी रक्षा की। यही कारण है कि यह कथा रक्षाबंधन के भावनात्मक अर्थ को और गहरा करती है।
रक्षाबंधन की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें महंगे उपहारों से अधिक महत्व भावनाओं का है। कलाई पर बंधा एक छोटा-सा धागा रिश्तों में विश्वास, जिम्मेदारी और प्रेम की बड़ी भावना जगा देता है। पटना में मनाए गए रक्षाबंधन के इन विविध प्रसंगों ने भी यही संदेश दिया कि रक्षा सूत्र केवल कलाई पर नहीं बंधता, बल्कि दिलों को जोड़ता है। आज जब जीवन की व्यस्तता और बदलती परिस्थितियां रिश्तों के बीच दूरियां पैदा कर रही हैं, ऐसे त्योहार परिवार और संबंधों की अहमियत को फिर से याद दिलाते हैं। रक्षाबंधन इसी विश्वास का पर्व है कि सच्चे रिश्ते उम्र, दूरी और परिस्थितियों से परे होते हैं कि वे हमेशा प्रेम और अपनत्व के रक्षा सूत्र से बंधे रहते हैं।
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