रिपोर्ट: Kaushlendra Pandey/नई दिल्ली/पटना। देश की राजनीति में लंबे समय से गर्माया मुद्दा — जातिगत जनगणना — पर आखिरकार मोदी सरकार ने बड़ा और ऐतिहासिक फैसला ले लिया है। केंद्र सरकार ने पहली बार संकेत दे दिए हैं कि वह जाति आधारित जनगणना को लेकर सकारात्मक कदम उठाने जा रही है। इस फैसले ने विपक्ष के एक बड़े हथियार को कमजोर कर दिया है। वहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे “देश की सामाजिक न्याय यात्रा में मील का पत्थर” बताया है।
केंद्र का बदला रुख
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई हालिया कैबिनेट बैठक में इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई और सूत्रों के अनुसार सरकार अब जातिगत आंकड़ों को एकत्र करने की दिशा में नीति तैयार करने की प्रक्रिया में है। अभी तक केंद्र इस मुद्दे पर टालमटोल करता रहा था, लेकिन 2024 के आम चुनावों के बाद बदलते सामाजिक समीकरणों और राज्यों की मांग को देखते हुए सरकार ने रणनीतिक बदलाव का फैसला किया है।
विपक्ष को लगा झटका
जातिगत जनगणना को लेकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, और अन्य विपक्षी दल लगातार मोदी सरकार पर हमला बोलते रहे हैं। उनका आरोप था कि सरकार सामाजिक न्याय के सवालों से भाग रही है। अब जब केंद्र सरकार ने इस दिशा में पहल की है, तो विपक्ष का यह मुद्दा काफी हद तक कमजोर हो गया है।
नीतीश कुमार गदगद
बिहार में जातिगत जनगणना की शुरुआत करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केंद्र के फैसले का जोरदार स्वागत किया है। उन्होंने कहा, “हमने बिहार में जातीय सर्वेक्षण कर समाज के सभी वर्गों की वास्तविक स्थिति सामने लाने का काम किया। अब जब केंद्र भी इस दिशा में कदम उठा रहा है, तो यह पूरे देश के लिए लाभकारी होगा। मोदी सरकार का यह निर्णय ऐतिहासिक है।”
राजनीतिक मायने
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला न केवल सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी दूरगामी परिणाम देगा। इससे भाजपा उन वर्गों तक अपनी पहुंच बढ़ा सकेगी जो अब तक खुद को उपेक्षित मानते थे। साथ ही, यह कदम राष्ट्रीय राजनीति में सामाजिक न्याय की धार को नई दिशा देगा।
निष्कर्ष
जातिगत जनगणना को लेकर मोदी सरकार का यह फैसला एक ऐतिहासिक मोड़ है, जिसने राजनीति की दिशा बदल दी है। जहां विपक्ष इससे सकते में है, वहीं नीतीश कुमार जैसे नेताओं के लिए यह सियासी जीत से कम नहीं।



























