Kaushlendra Pandey/वंदे मातरम गीत के 150 वर्ष पूरा होने पर रामेश्वर महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान और इतिहास विभाग के संयुक्त तत्वावधान में वंदे मातरम : भारतीय राष्ट्रवाद एवं राजनैतिक चेतना का उद्गम विषय पर एक दिवसीय विशेष व्याख्यान का आयोजन किशोरी सिन्हा सभागार में किया गया । कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बी.एन. मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा के पूर्व कुलसचिव प्रो.विपिन कुमार राय रहे तथा विशिष्ट वक्ता एस.एन. एस. महाविद्यालय मोतिहारी के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. अमित कुमार सातनकर की उपस्थिति रही । अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. श्यामल किशोर ने की । कार्यक्रम की शुरुआत रामेश्वर बाबू की प्रतिमा पर प्राचार्य और अतिथियों द्वारा माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन से हुई । कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत इतिहास विभाग के अध्यक्ष और कार्यक्रम के संयोजक डॉ. बादल कुमार ने किया और विषय प्रवेश कराते हुए एन. सी.सी. पदाधिकारी डॉ. रजनी रंजन ने बताया कि वंदे मातरम राष्ट्रगीत के माध्यम से नागरिकों में राष्ट्रभावना का उदय हुआ । कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. विपिन कुमार राय ने कहा कि देश में 1765 के बाद ज़ुल्म और अन्याय की शुरुआत होती है। भारतीयों ने अपनी सभ्यता और संस्कृति पर गर्व करते हुए वंदे मातरम राष्ट्रगीत के माध्यम से स्वयं को राष्ट्र के लिए उद्वेलित किया । सर्वप्रथम बंकिम चंद्र चटर्जी ने वंदे मातरम गीत को साप्ताहिक पत्र बंग दर्शन में सन 1872 में लिखा । बंग भंग आंदोलन में इस गीत को गाने के बाद यह अंग्रेजों के विरोध का सूत्रवाक्य बन गया । प्रो. राय ने वन्देमातरम गीत को केवल बांग्ला संस्कृति का उदय ही नहीं बल्कि भारतीय, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उदय भी बताया । व्याख्यान के विशिष्ट वक्ता एस.एन. एस. महाविद्यालय मोतिहारी के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. अमित सातनकर ने वन्देमातरम गीत के इतिहास और उसकी मूल चेतना से श्रोताओं को अवगत कराया । उन्होंने कहा कि इस गीत को लेकर तमाम विवाद खड़े किए गए । इस गीत पर केवल बिंब विधान ही नहीं अपितु बुतपरस्ती का भी आरोप लगाया गया । वन्देमातरम ने औपनिवेशिक दौर में भारतीयों के मन में राष्ट्रवाद का बीज बोया ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. श्यामल किशोर ने कहा कि धर्म, ज्ञान और अध्यात्म ही भारत की पहचान रही है । लार्ड मैकाले ने हमारी भारतीय सांस्कृतिक विरासत को अपनी शिक्षा पद्धति से तोड़ने का प्रयास किया और काफी हद तक वह इसमें सफल भी रहा जिसके परिणामस्वरूप भारतीयों ने गुलामी की यातनाएं झेलीं । तथा दर्शन के महत्वपूर्ण विषय पूर्व स्थापति सामंजस्य के सिद्धांत पर गंभीर विमर्श भी किया । प्रो. किशोर ने आगे भी बताया कि स्वाधीनता संग्राम के समय विदेशी हुकूमत की यातनाओं की परवाह न करते हुए भारत के प्रत्येक नागरिक, सेनानी और क्रांतिकारियों ने वन्देमातरम गीत के साथ जुड़कर सामूहिक चेतना जागृत की । स्वाधीनता संग्राम के वक्त गांव-नगरों में प्रभात फेरियों के माध्यम से यह गीत पूरे देश को एकजुट करता था । 1875 में रचे गए इस गीत ने न केवल आजादी की लड़ाई को बल दिया, अपितु हमारे भारत को नई दिशा देने में भी सफलता हासिल की । यह गीत संपूर्ण भारत को राष्ट्र माता के भाव से जोड़ता है ।
कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम पदाधिकारी डॉ. शारदानंद सहनी ने किया तथा कार्यक्रम का संचालन राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष और कार्यक्रम के आयोजन सचिव डॉ. गोवर्धन ने किया । इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राध्यापकों डॉ. वसीम रेजा, डॉ. अविनाश कुमार, डॉ. माहेश्वर प्रसाद सिंह, डॉ. संदीप कुमार सिंह, डॉ. पूनम कुमारी, डॉ. ऐनी जोया सहित एन सी सी,एन एस एस के स्वयंसेवक, छात्र – छात्राएं, मीडियाकर्मी और कर्मचारियों की उपस्थिति रही ।





























