पटना,१२ मई। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने ( जहाँ प्रधानमंत्री जी के लिए आपातकालीन सुरक्षित क्षेत्र बनाया गया है) प्रधानमंत्री से उनकी इस यात्रा में “हिन्दी” को “भारत की राष्ट्रभाषा” घोषित करने की माँग की है। सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ की ओर से इस आशय के बड़े-बड़े प्रचार-पट्ट (होर्डिंग्स) सम्मेलन परिसर और मुख्यद्वार पर लगाए गए हैं। सम्मेलन की कार्य समिति की और से किए गए अपने आग्रह में डा सुलभ ने कहा है कि “एक राष्ट्रभाषा” ही पूरे देश को एक सूत्र में बाँध सकती है। देश के राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्र चिन्ह की भाँति ही प्रत्येक स्वतंत्र देश की एक राष्ट्रभाषा भी होती है, होनी चाहिए। राष्ट्रीय एकता के लिए यह एक अनिवार्य व्यवस्था है। दुर्भाग्य से भारत उन कुछ थोड़े से देशों में है, जिसकी कोई एक राष्ट्रभाषा नहीं है और संसार का एक मात्र देश है, जिसकी केंद्रीय सरकार की राजकीय भाषा, एक विदेशी भाषा है, जो देश-वासियों के लिए “वैश्विक-लज्जा” का विषय है।डा सुलभ ने प्रधानमंत्री जी से आग्रह किया है कि जून में गठित होने वाली आगामी केंद्रीय सरकार की मंत्री परिषद की प्रथम बैठक में यह संकल्प पारित हो कि “हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा” होगी।डा सुलभ ने प्रधानमंत्री के नाम एक पत्र भी लिखा है, जिसमें इस आशंका को निर्मूल सिद्ध किया गया है कि हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा बनाए जाने से भारत की किसी भी अन्य भाषा का अहित होगा, जैसा कि बार-बार भ्रम फैलाया जाता है। उन्होंने कहा कि इससे अन्य भारतीय भाषाएँ भी समृद्ध होंगी, किसी का अहित तो कदापि नहीं होगा। बल्कि यह देश एक सूत्र में बँध जाएगा और हिन्दी, बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से संसार की सबसे बड़ी भाषा बन जाएगी। राष्ट्र-हित में उठाया गया यह सबसे बड़ा पग माना जाएगा और आने वाली सैकड़ों पीढ़ियाँ प्रधानमंत्री को स्मरण करती रहेगी। यह प्रधानमंत्री की यशो आयु को हज़ारों वर्षों का बना देगी ।



























