Kaushlendra Pandey / जद (यू0) प्रदेश प्रवक्ता श्री परिमल कुमार ने सोशल संवाद करते हुए कहा कि बिहार में वर्ष 2005 के बाद शिक्षा के क्षेत्र में जो ऐतिहासिक परिवर्तन हुआ है, वह सुशासन, स्पष्ट नीयत और दूरदर्शी नीति का परिणाम है। जब वर्ष 2005 में मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने राज्य की कमान संभाली, उस समय बिहार की शिक्षा व्यवस्था अनेक चुनौतियों से घिरी हुई थी। विद्यालयों की कमी, शिक्षकों का अभाव, सीमित बजट और बड़ी संख्या में स्कूल से बाहर बच्चेकृये उस दौर की वास्तविकता थी।
आज दो दशक बाद तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। वर्ष 2005 में शिक्षा का कुल बजट मात्र 4,366 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2026-27 में बढ़कर 68,216 करोड़ रुपये हो गया है। लगभग 17 गुना की यह वृद्धि स्पष्ट करती है कि शिक्षा राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता रही है। बजट में यह ऐतिहासिक विस्तार ही बुनियादी बदलावों की आधारशिला बना।
तकनीकी शिक्षा में भी क्रांतिकारी विस्तार हुआ है। वर्ष 2005 में जहाँ केवल 2 सरकारी इंजीनियरिंग काॅलेजों में 460 सीटें थीं, वहीं 2025 तक 38 सरकारी इंजीनियरिंग काॅलेजों में 14,469 सीटें उपलब्ध हो चुकी हैं। पाॅलिटेक्निक संस्थानों की संख्या 13 से बढ़कर 46 और आईटीआई की संख्या 23 से बढ़कर 152 हो गई है। अब बिहार के विद्यार्थियों को तकनीकी शिक्षा के लिए राज्य से बाहर जाने की मजबूरी नहीं है।
ये आँकड़े मात्र संख्याएँ नहीं हैं। मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर बिहार ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब नीयत साफ हो और नीति स्पष्ट हो, तो परिवर्तन अवश्यंभावी होता है।




























