जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 06 जुलाई :: मनुष्य के चरित्र का मूल्यांकन यदि किसी एक गुण से किया जाए तो अधिकांश लोग “ईमानदारी” का नाम लेंगे। बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि सत्य बोलो, छल मत करो, किसी का अधिकार मत छीनो और अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करो। यही कारण है कि ईमानदार व्यक्ति समाज में सम्मान प्राप्त करता है, जबकि बेईमान व्यक्ति तिरस्कार का पात्र बनता है। लेकिन क्या केवल आर्थिक या व्यवहारिक ईमानदारी ही पर्याप्त है? क्या ऐसा व्यक्ति, जो धन का दुरुपयोग नहीं करता है, स्वयं को सदैव नैतिक रूप से श्रेष्ठ मान सकता है? क्या ईमानदारी के पीछे छिपा अहंकार व्यक्ति को उस स्थान पर पहुँचा सकता है जहाँ वह स्वयं को नियमों से ऊपर समझने लगे?
यही वह प्रश्न है जिस पर भारतीय दर्शन, वेदांत, उपनिषद, भगवद्गीता और संत परंपरा बार-बार विचार करती रही है। इन सभी का निष्कर्ष लगभग एक ही है- ईमानदारी तभी तक सद्गुण है, जब तक उसमें विनम्रता का संयोग बना रहे। जैसे ही उसमें “मैं ही सबसे अधिक त्यागी हूँ”, “मैं ही सबसे अधिक पवित्र हूँ” अथवा “मेरे निर्णयों पर प्रश्न नहीं उठाए जा सकते” जैसी मानसिकता प्रवेश करती है, उसी क्षण ईमानदारी का स्थान अहंकार ले लेता है।
आज सार्वजनिक जीवन में भी यही चुनौती दिखाई देती है। किसी संस्था का प्रमुख वर्षों तक उत्कृष्ट कार्य कर सकता है, लेकिन यदि पारदर्शिता की जगह व्यक्तिवाद आ जाए, तो उसके समूचे योगदान पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। इस संदर्भ में सार्वजनिक चर्चा में आए चंपत राय से जुड़े विवाद भी व्यापक विमर्श का अवसर प्रदान करते हैं। यहाँ उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि सार्वजनिक विश्वास किन आधारों पर टिकता है और किस प्रकार टूटता है।
सामान्य धारणा यह है कि जो चोरी न करे, रिश्वत न ले, झूठ न बोले और आर्थिक रूप से स्वच्छ रहे, वही ईमानदार है। यह परिभाषा अधूरी है। वास्तविक ईमानदारी के पाँच आधार माने जा सकते हैं- सत्य के प्रति निष्ठा। कर्तव्य के प्रति समर्पण। पारदर्शिता। उत्तरदायित्व। आत्मपरीक्षण। यदि इन पाँच में से अंतिम दो तत्व समाप्त हो जाएँ, तो ईमानदारी धीरे-धीरे औपचारिकता बन जाती है। कई बार व्यक्ति वास्तव में भ्रष्ट नहीं होता है, लेकिन वह स्वयं को इतना निष्कलंक मान बैठता है कि किसी भी आलोचना को अपने विरुद्ध षड्यंत्र समझने लगता है। यही स्थिति सबसे अधिक खतरनाक होती है।
अधिकांश लोग समझते हैं कि अहंकार का अर्थ केवल घमंड है। भारतीय दर्शन इससे कहीं आगे जाता है। अहंकार का वास्तविक अर्थ है “स्वयं को सत्य का अंतिम मानक मान लेना।” यही कारण है कि अहंकारी व्यक्ति हमेशा ऊँची आवाज़ में बात नहीं करता। कई बार वह अत्यंत विनम्र भाषा बोलता है, साधारण वस्त्र पहनता है, सादा भोजन करता है, लेकिन भीतर यह विश्वास पाल लेता है कि “मेरे जैसा त्याग किसी ने नहीं किया।” यहीं से पतन प्रारम्भ होता है।
यह बात सुनने में विरोधाभासी लग सकती है। त्याग तो महान माना जाता है। फिर त्याग अहंकार कैसे बन सकता है? गीता कहती है कि त्याग तभी तक श्रेष्ठ है, जब तक त्याग करने वाला स्वयं को त्यागी न मानने लगे। जैसे ही व्यक्ति अपने त्याग का लेखा-जोखा रखने लगे, वह त्याग व्यापार बन जाता है। आज अनेक सामाजिक और धार्मिक संगठनों में यह समस्या दिखाई देती है। कोई व्यक्ति वर्षों तक सेवा करता है।फिर धीरे-धीरे उसे लगने लगता है कि संस्था उसी के कारण चल रही है। यहीं से संस्था का केंद्र सिद्धांत नहीं, व्यक्ति बन जाता है।
यह संसार का सबसे खतरनाक भ्रम है। भ्रष्ट व्यक्ति अपने अपराध जानता है। लेकिन नैतिक अहंकार से ग्रस्त व्यक्ति अपने दोष देख ही नहीं पाता। उसे लगता है कि “मैं तो ईमानदार हूँ।” यही सोच उसे आत्मपरीक्षण से दूर कर देती है। धीरे-धीरे उसके आसपास ऐसे लोग इकट्ठा होने लगते हैं जो उसकी प्रशंसा करते हैं। फिर आलोचना समाप्त हो जाती है और जहाँ आलोचना समाप्त होती है, वहाँ पतन शुरू हो जाता है।
भारत की सबसे प्राचीन परंपरा यही रही है कि व्यक्ति नहीं, व्यवस्था सर्वोपरि होती है। राम स्वयं वन चले गए क्योंकि व्यवस्था बड़ी थी। कृष्ण ने स्वयं शस्त्र नहीं उठाया क्योंकि नियम बड़े थे। भीष्म ने व्यक्तिगत इच्छा त्याग दी क्योंकि राज्य बड़ा था। यदि किसी संस्था का प्रमुख स्वयं को संस्था से बड़ा समझने लगे, तो धीरे-धीरे निर्णय सामूहिक न रहकर व्यक्तिगत होने लगते हैं। यह किसी भी संगठन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता है।
विश्वास दो चीजों से बनता है पहला- ईमानदारी। दूसरा- पारदर्शिता। केवल ईमानदारी पर्याप्त नहीं है। यदि किसी संस्था पर प्रश्न उठे और वह जांच, संवाद अथवा स्पष्टीकरण से बचने लगे, तो जनता के मन में संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। लोकतांत्रिक समाज में सार्वजनिक संस्थाएँ केवल सही होने से नहीं चलती, बल्कि उन्हें सही दिखना भी पड़ता है। इसीलिए पारदर्शिता विश्वास की अनिवार्य शर्त है।
हाल के समय में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और उसके महासचिव चंपत राय से संबंधित कुछ विषय सार्वजनिक चर्चा में आए हैं। इन पर विभिन्न प्रकार के आरोप, प्रत्यारोप, मीडिया रिपोर्टें और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सार्वजनिक विमर्श में उठे किसी भी आरोप को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसके संबंध में अधिकृत जांच, प्रमाण या आधिकारिक निष्कर्ष उपलब्ध न हो। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब किसी अत्यंत प्रतिष्ठित धार्मिक संस्था पर सवाल उठते हैं, तब उसका उत्तर किस प्रकार दिया जाना चाहिए? क्या केवल यह कह देना पर्याप्त है कि “हम ईमानदार हैं”? या फिर संस्था को हर प्रश्न का तथ्यों सहित उत्तर देना चाहिए? यहीं से पारदर्शिता का महत्व प्रारंभ होता है।
ईमानदार व्यक्ति की परीक्षा तब नहीं होती जब उसकी प्रशंसा हो रही हो। उसकी वास्तविक परीक्षा तब होती है जब उसके सामने तीन विकल्प हो। पहला- गलती स्वीकार करना। दूसरा- जांच का स्वागत करना। तीसरा- आलोचना को षड्यंत्र बताकर टाल देना। इतिहास बताता है कि महान संस्थाएँ पहला और दूसरा मार्ग चुनती है। जबकि कमजोर संस्थाएँ चुनती है तीसरा।
धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं है। धर्म का अर्थ है जिससे समाज का विश्वास बना रहे। यदि कोई धार्मिक संस्था करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, तो उसके पदाधिकारियों पर सामान्य संस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक नैतिक जिम्मेदारी होती है। उनका प्रत्येक निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व भी रखता है। इसीलिए ऐसे पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए पारदर्शिता, विनम्रता और उत्तरदायित्व अत्यंत आवश्यक माने जाते हैं।
ईमानदारी मनुष्य का महान गुण है, लेकिन वह अंतिम गुण नहीं है। उससे भी बड़ा गुण है- विनम्रता और विनम्रता से भी बड़ा गुण है- आत्मपरीक्षण। जो व्यक्ति प्रतिदिन स्वयं से प्रश्न पूछता है, वही वास्तविक अर्थों में ईमानदार रह सकता है। जो व्यक्ति स्वयं को प्रश्नों से ऊपर मान लेता है, वह चाहे कितना भी त्यागी क्यों न हो, उसके भीतर अहंकार जन्म लेने लगता है। इसी कारण भारतीय दर्शन बार-बार कहता है कि “सत्य का रक्षक वही बन सकता है, जो स्वयं को सत्य से बड़ा न समझे।”
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