कौशलेन्द्र पाण्डेय /बिहार की राजनीति में कुछ नाम केवल पदों से नहीं, बल्कि एक पूरे दौर से पहचाने जाते हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी ऐसा ही एक नाम हैं। लगभग दो दशकों तक बिहार की सत्ता के केंद्र में रहने वाले इस नेता ने न केवल सरकार चलाई, बल्कि हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का अवसर भी दिया। उनके दौर में न जाने कितने लोग विधायक बने, सांसद बने, राज्यसभा पहुँचे, मंत्री बने और विभिन्न बोर्ड-निगमों के चेयरमैन बने।
लेकिन आज जब उनके राजनीतिक जीवन के एक बड़े मोड़ की चर्चा हो रही है, तो एक अजीब सी खामोशी दिखाई देती है। यह खामोशी केवल विपक्ष की नहीं, बल्कि उन लोगों की भी है जो कभी नीतीश कुमार के राजनीतिक कद के सहारे आगे बढ़े। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों है कि इतने लंबे समय तक जिनके नाम से राजनीति चलती रही, आज वही नेता अपने साथियों की आवाज़ से लगभग खाली दिखाई दे रहे हैं।
राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है, सत्ता बदलना भी लोकतंत्र की प्रकृति है। लेकिन किसी नेता की विदाई किस तरह से होती है, यह उस समाज और उस राजनीति का चरित्र भी दिखाती है। बिहार में एक समय नारा गूंजता था — “नीतीश ही मुख्यमंत्री थे, हैं और रहेंगे।” यह नारा केवल एक राजनीतिक जुमला नहीं था, बल्कि उस दौर की राजनीतिक सच्चाई का प्रतीक था।
आज वही सवाल सामने खड़ा है कि अगर परिस्थितियाँ बदली हैं तो क्या इस बदलाव को पारदर्शिता के साथ जनता के सामने नहीं रखा जाना चाहिए था? अगर स्वास्थ्य कारण हैं, तो उन्हें स्पष्ट रूप से बताया जा सकता था। अगर राजनीतिक रणनीति है, तो उसका भी स्पष्ट संवाद होना चाहिए था। लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत संवाद और विश्वास ही होता है।
नीतीश कुमार की राजनीति का मूल्यांकन केवल आज की घटना से नहीं किया जा सकता। उनके शासनकाल में बिहार ने कई बदलाव देखे। कानून-व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू हुई, सड़कों और बुनियादी ढांचे पर काम हुआ, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए पंचायतों में आरक्षण लागू हुआ, साइकिल और पोशाक जैसी योजनाओं ने सामाजिक परिवर्तन की नई कहानी लिखी। इन उपलब्धियों से असहमति हो सकती है, आलोचना भी हो सकती है, लेकिन इन्हें पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
इसलिए जब कोई इतना लंबा राजनीतिक सफर तय करने वाला नेता किसी मोड़ पर पहुँचता है, तो सवाल केवल उस नेता का नहीं होता, बल्कि उस राजनीति का भी होता है जिसने उसे बनाया और जिसने उसके साथ काम किया।
आज बिहार की राजनीति जिस दिशा में खड़ी है, वहाँ यह जरूरी है कि इतिहास के साथ न्याय किया जाए। मतभेद हो सकते हैं, आलोचना भी हो सकती है, लेकिन योगदान को याद रखना भी उतना ही जरूरी है।
नीतीश कुमार की विदाई अगर हो रही है, तो वह केवल एक व्यक्ति की विदाई नहीं होगी। वह बिहार की राजनीति के एक पूरे अध्याय का समापन भी होगा। और इतिहास जब भी इस अध्याय को पढ़ेगा, तो वह यह जरूर पूछेगा कि क्या इस अध्याय को बंद करते समय राजनीति ने अपने पुराने साथी के साथ वैसा सम्मान दिखाया, जिसका वह हकदार था।
— कंट्री इनसाइड न्यूज एजेंसी



























