जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 17 मार्च ::आधुनिक दुनिया की अर्थव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण संसाधन पर टिकी हुई है, वह है ऊर्जा। ऊर्जा के बिना आज का कोई भी समाज, उद्योग या आर्थिक गतिविधि संभव नहीं है। बिजली, पेट्रोलियम, गैस, कोयला और नवीकरणीय ऊर्जा के विभिन्न स्रोत आधुनिक जीवन की आधारशिला बन चुका है। भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देश के लिए ऊर्जा की आवश्यकता लगातार बढ़ती जा रही है। बढ़ती आबादी, बढ़ते शहर, उद्योगों का विस्तार और परिवहन व्यवस्था। इन सबके कारण ऊर्जा की मांग हर साल बढ़ती जा रही है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ी चुनौती भी सामने है ऊर्जा सुरक्षा। ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ है कि किसी देश के पास अपनी जरूरत के अनुसार पर्याप्त और स्थिर ऊर्जा स्रोत उपलब्ध हों और उनकी आपूर्ति किसी बाहरी संकट से बाधित न हो। आज भारत के सामने यही चुनौती सबसे बड़ी है।
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इस आर्थिक विकास के साथ ऊर्जा की खपत भी तेजी से बढ़ रही है। कुछ प्रमुख तथ्य इस स्थिति को स्पष्ट करते हैं कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। प्राकृतिक गैस की मांग भी लगातार बढ़ रही है और बिजली की खपत हर वर्ष नए रिकॉर्ड बना रही है। यह स्थिति बताती है कि भारत की अर्थव्यवस्था ऊर्जा पर कितनी निर्भर है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा की सबसे बड़ी कमजोरी है आयात पर अत्यधिक निर्भरता। देश में तेल और गैस के भंडार सीमित हैं। इस कारण भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। विशेष रूप से मिडिल ईस्ट के देशों से भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है। इन देशों में शामिल हैं सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत, कतर। अगर इन क्षेत्रों में राजनीतिक अस्थिरता या युद्ध होता है तो उसका असर सीधे भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ता है।
मिडिल ईस्ट दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार का क्षेत्र है। दुनिया के कुल तेल भंडार का लगभग 48 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र में है। यही कारण है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में मिडिल ईस्ट की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब भी इस क्षेत्र में युद्ध या तनाव बढ़ता है तो तेल की कीमतों में उछाल आ जाता है और इसका असर दुनिया की हर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध का असर भारत पर कई तरीकों से पड़ सकता है। युद्ध के कारण तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे कीमतें बढ़ती हैं। अगर समुद्री मार्गों पर तनाव बढ़ता है तो तेल परिवहन प्रभावित हो सकता है। तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ जाता है। ऊर्जा महंगी होने से परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ती है।
इन चुनौतियों को देखते हुए भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ऊर्जा कूटनीति को मजबूत किया है। ऊर्जा कूटनीति का मतलब है कि देश विभिन्न देशों के साथ ऐसे संबंध बनाए जिससे ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित रहे। भारत ने इस दिशा में कई कदम उठाए हैं। पहले भारत मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट से तेल आयात करता था। लेकिन अब भारत ने अपने आयात स्रोतों का विस्तार किया है। आज भारत तेल आयात करता है रूस से, अमेरिका से, अफ्रीकी देशों से और लैटिन अमेरिकी देशों से। इससे ऊर्जा आपूर्ति का जोखिम कम होता है।
हाल के वर्षों में भारत ने रूस से तेल आयात में काफी वृद्धि की है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण रूस ने तेल कम कीमत पर बेचना शुरू किया। भारत ने इस अवसर का लाभ उठाया और बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीदना शुरू किया। इससे भारत को दो फायदे हुए। पहला सस्ता तेल मिला और दूसरा ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित हुई।
ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए भारत ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserve) भी बनाया है। यह भंडार आपातकालीन स्थिति के लिए होता है। अगर किसी कारण से तेल की आपूर्ति बाधित हो जाए तो इन भंडारों का उपयोग किया जा सकता है। भारत ने ऐसे भंडार बनाए हैं विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पाडुर। भविष्य में इन भंडारों का विस्तार करने की योजना है।
ऊर्जा सुरक्षा का एक और महत्वपूर्ण रास्ता है नवीकरणीय ऊर्जा। नवीकरणीय ऊर्जा वह स्रोत हैं जो कभी खत्म नहीं होते। जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा और बायो ऊर्जा। भारत ने पिछले एक दशक में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में काफी प्रगति की है।
भारत आज दुनिया के प्रमुख सौर ऊर्जा उत्पादक देशों में शामिल हो चुका है। सरकार ने राष्ट्रीय सौर मिशन के तहत सौर ऊर्जा उत्पादन को तेजी से बढ़ाया है। आज देश के कई राज्यों में बड़े-बड़े सौर ऊर्जा पार्क स्थापित किए जा चुके हैं। राजस्थान और गुजरात इस क्षेत्र में अग्रणी हैं।
पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम करने के लिए भारत इलेक्ट्रिक वाहनों को भी बढ़ावा दे रहा है। सरकार ने कई योजनाएँ शुरू की हैं। FAME योजना, इलेक्ट्रिक बस परियोजनाएँ और चार्जिंग स्टेशन नेटवर्क। अगर आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहन तेजी से बढ़ते हैं तो पेट्रोलियम उत्पादों की मांग में कमी आ सकती है। हालांकि ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भारत ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, लेकिन चुनौतियाँ अभी भी बड़ी हैं। आयात पर निर्भरता, ऊर्जा की बढ़ती मांग, वैश्विक बाजार की अस्थिरता और युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव प्रमुख हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा के लिए तीन प्रमुख रणनीतियों पर ध्यान देना होगा। पहला जितने अधिक देशों से तेल आयात होगा, जोखिम उतना कम होगा। दूसरा देश में तेल और गैस की खोज को बढ़ावा देना होगा और तीसरा सौर और पवन ऊर्जा को तेजी से बढ़ाना होगा।
आज की दुनिया में ऊर्जा सुरक्षा केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का भी विषय बन चुका है। जिस देश के पास स्थिर ऊर्जा आपूर्ति होती है, वही देश आर्थिक रूप से मजबूत और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली बन सकता है। भारत के सामने चुनौती बड़ी है, लेकिन संभावनाएँ भी उतनी ही बड़ी हैं। अगर सही नीतियाँ और दीर्घकालिक योजनाएँ अपनाई जाएँ तो भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित कर सकता है, बल्कि भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व भी हासिल कर सकता है।





























