पुनीता कुमारी श्रीवास्तव, पटना, 04 अप्रैल :: बिहार का महात्मय:- बिहार भारत की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। बिहार की भूमि सिर्फ ऐतिहासिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृति, बौद्धिक और साहित्यिक परंपरा की दृष्टि से भी अत्यंत ही समृद्ध रही है। प्राचीन काल में बिहार को मगध के नाम से जाना जाता था। ये मगध भारतीय इतिहास का सबसे प्रभावशाली और शक्तिशाली महाजनपद था। राजगृह और पाटलीपुत्र जो अब इस वर्तमान में राजगीर और पटना के नाम से जाने जाते हैं, ये दोनों इसके प्रमुख नगर थे। नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय शिक्षा के सुविख्यात केंद्र माने जाते थे, यहाँ पर देश विदेश के विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण के लिए आया करते थे। बिहार की इस भूमि से मानवता को शांति, करुणा, ज्ञान और अहिंसा का संदेश मिला। बोधगया में गौतमबुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुए और उन्होंने विश्व को मध्यम मार्ग और आत्म ज्ञान का दर्शन दिया। भगवान महावीर ने अपने जैन धर्म के माध्यम से सत्य, अहिंसा और संयम का मार्ग प्रशस्त किया और लोगों को मार्ग दर्शन दिया।
बिहार की संस्कृति:- बिहार केवल एक राज्य ही नहीं है, बल्कि यह एक विचारधारा भी है। बिहार की संस्कृति अत्यंत ही मनभावन और शोभायमान है। यहाँ की संस्कृति हमेशा मुस्कुराती रहती है और साहित्य हमारी आत्मा में समाया रहता है। बिहार की संस्कृति समन्वयात्मक, बहुआयामी और लोकमूलक है। यहाँ सभी जाति और धर्म के भक्ति परम्परा का सुंदर संगम दिखाई पड़ता है। बिहार की मिट्टी में संघर्ष, श्रम, और स्वाभिमान समाया हुआ है। बिहार को भारत की सभ्यता की जन्मभूमि भी कहा जाता है। बिहार सिर्फ अतीत का ही धरोहर नहीं , यह तो एक जीवंत परंपरा है, जो आज भी समाज की नैतिक मूल्यों, सामाजिक एकता और मानवता की भावना को बहुत ही सशक्त बनाती है। यह संस्कृति, त्याग, सहीष्णुता, ज्ञान और संघर्ष की संस्कृति है।
बिहार की संस्कृति हमें ये सिखाती है की हमारी सच्ची पहचान भौतिक विकास में नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, सामाजिक समरसता और सांस्कृति चेतना में समाहित है।
बिहार अपने इसी पहचान कर कारण, भारत में ही नहीं, विश्व में भी गौरव बना हुआ है।
बिहार केवल अतीत में ही महान नहीं था, बल्कि यह आज भी अपनी कला, संस्कृति और लोकपरंपराओ से समृद्ध बना हुआ है।
बिहार की लोक कला:- यहाँ की कला, लोकसंगीत और नृत्य अत्यंत ही मनमोहक है। सोहर, कजरी, चैता और झूमर जैसे लोकगीत तथा झिझिया, जट-जटिन, डोमकच, और बिदेसिया जैसे लोकनृत्य सामाजिक जीवन की जीवंत रूप को प्रस्तुत करती है, क्योंकि बिहार की सभी कला जीवंत रूप में ही है।
भूबिहार की चित्रकला:- मधुबनी (मिथिला) चित्रकला पूरे विश्व में प्रसिद्ध चित्रकला मानी जाती है।
मंजूषा कला:- ये कला भागलपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों से जुड़ी कला है। यह चित्रकला संदूक, पेटी और बक्से पर बनाई जाती है।
टिकुली कला :- यह बिहार के पटना क्षेत्र की पारंपरिक कला है। पहले सिर्फ काँच की टिकुली (बिंदी) बनाने से शुरू हुई और अब काँच के समानो के ऊपर चित्रकारी की जाती है।
पिपराहा कला :- यह बिहार की पारंपरिक लोक हस्तशिल्प कला है, जिसमे लकड़ी, बांस और घास की सहायता से घरेलू सजावटी वस्तुएँ बनाई जाती है। यह ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में बनाई जाती है।
अरिपन चित्रकला :- यह बिहार के मिथिला क्षेत्र से जुड़ी कला है। यह कला जमीन पर चावल की घोल से बनाई जाती है। यह पवित्रता, मंगल और शुभता का प्रतीक माना जाता है।
कोहबर चित्रकला:- यह बिहार की पारंपरिक विवाह पर आधारित चित्रकला है, यह विवाह के समय दीवाल पर बनाई जाती है और वही पर विवाह के बाद वर-वधु को बैठाया जाता है। यह शुभ मंगल का प्रतीक माना जाता है।
भिति चित्रकला:- यह चित्रकला बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में लोकसंस्कृति का प्रतीक माना जाता है। यह दीवाल पर बनाई जाने वाली चित्रकला है, देवी देवता से लेकर रंग बिरंगे चित्र दिवालों पर बनाये जाते है।
बिहार का पर्व-त्योहार :- बिहार का हर पर्व – त्योहार भक्ति और आस्था से ही जुड़े हुए है।
छठ महापर्व:- यह बिहार के सूर्य उपासना का विश्व प्रसिद्ध पर्व है, नहाय खाय से शुरु होने वाला और चार दिन तक चलने वाला, ये पर्व आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा बिहार के पर्वो में जितिया, तीज, मधुश्रावणी, दीपावली, होली, समाचकेवा, ईद, गुरूपर्व, सावन इत्यादि भी भक्ति और आस्था का प्रतीक माना जाता है।
बिहार का खानपान:- खानपान में देखे तो लिट्टी-चोखा बिहार का सबसे प्रसिद्ध पारंपरिक भोजन माना जाता है। इसके अलावा ठेकुआ, खाजा, अनारसा, तिलकूट, सतू परम्परा, दाल-भात-चोखा ये बिहार का सात्विक आहार है। दूर दूर से भी लोग हमारे बिहार में आकर इस भोजन का लुप्त उठाते हैं।
बिहार की भाषा और बोली :- भाषा की दृष्टि से देखे तो बिहार बहुभाषी प्रदेश है, यहाँ हिंदी के साथ-साथ मैथिली, मगही, भोजपुरी, अंगिका, बज्जिका जैसे समृद्ध लोकभाषाएँ भी बोली जाती है। सिर्फ संवाद के लिए ही इन सब भाषाओं का प्रयोग नहीं किया जाता, बल्कि लोक कथाओं, लोकगीतों, साहित्य और सामाजिक परम्पराओं में भी इसका उपयोग होता है। बिहार का लोक साहित्य, जनजीवन की मूल्यों, संघर्षो और संवेदनाओ को भी अभीव्यक्त करता है। बिहार में लोकभाषा में हर पर्व, त्योहारों में महिलाओं द्वारा जो गीत गाई जाती है, वह अत्यंत ही मनमोहक होती है। ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में लोकभाषा में ही गीत गाई जाती है।
बिहार का साहित्य दर्शन:- बिहार की आत्मा उसके साहित्य में बसती है, क्योंकि यहाँ का साहित्य सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करता, बल्कि समाज को नई-नई दिशा निर्देश और मार्ग दर्शन देता है। युवाओं में चेतना जगाता है, मानवता की स्थापना कराता है और अन्याय के विरुद्ध प्रतिउत्तर देने में कभी पीछे नहीं हटता । बिहार की भूमि ने संस्कृत, पाली , प्राकृत, अपभ्रंश से लेकर आधुनिक हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं को भी विकसित किया है।
बिहार के साहित्यकारों के बारे में देखे तो “महर्षि वाल्मीकि” साहित्य के प्रथम कवि माने जाते है, इनको आदिकवि भी कहा जाता है, संस्कृत साहित्य में काव्य परंपरा का नींव वाल्मीकि ने ही रखा था , इनके द्वारा रचित रामायण महाकाव्य सिर्फ बिहार और भारत में ही नहीं पूरे विश्व में विख्यात है।
अश्वघोष :- ये बिहार के प्राचीन मगध क्षेत्र से आते है। ये भी संस्कृत के महान कवि, नाटककार, और दार्शनिक थे। इनको बौद्ध धर्म के प्रथम बौद्ध कवि माना जाता है। इनके द्वारा रचित ग्रंथ के नाम है :- बुद्धचरित, सौंदरानंद, बज्रसूची इत्यादि।
आर्यभट्ट :- ये बिहार के प्राचीन मगध क्षेत्र से आते है। इन्होंने कुसुमपुर (वर्तमान पटना) में रहकर अपना अध्ययन और लेखन पूरा किया था। ये खगोल विज्ञान और गणित के विद्वान माने जाते है। इन्होंने ही शून्य का अविष्कार किया था। इनके द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ के नाम “आर्यभटीय” है।
डॉ सच्चिदानंद सिन्हा:- इनका जन्म 10 नवंबर 1871 को बिहार के बक्सर जिले के “मुरार” गाँव में हुआ था। ये एक संभ्रांत कायस्थ परिवार से आते है। ये वरिष्ठ पत्रकार, वकील, शिक्षाविद्, समाजवादी विचारक और लेखक भी थे।
इनको “आधुनिक बिहार का जनक” भी कहा जाता है । ये हिंदी और अंग्रेजी भाषा में संस्कृति, ग्रामीण अर्थशास्त्र, राजनीति और समाजवाद पर दर्जनों पुस्तकों की रचना किये।
विद्यापति:- इनका जन्म बिहार के मधुबनी (मिथिला) जिले के बिस्पी गाँव में हुआ था। इनका उपनाम मैथिल कोकिल था। इन्होंने मैथिली, संस्कृत और अवहट्ठ (अपभ्रंश)भाषा में अपनी रचना की है। इनकी प्रसिद्ध रचना में “पदावली” आती है, जिनमे राधा- कृष्ण के प्रेम और भक्ति पर आधारित गीत है। इसमें श्रृंगार रस की प्रधानता है। इसके अलावा इनके प्रसिद्ध ग्रंथ कीर्तिलता , कीर्तिपताका, पुरुषपरीक्षा, भूपरिक्रमा इत्यादि है।
रामधारी सिंह दिनकर:- इनको राष्टकवि के रूप में भी जाना जाता है। इनका जन्म 23 सितंबर1908 को बिहार के बेगुसराय जिले के सिमरिया गाँव मे हुआ था और निधन 24 अप्रैल 1974 को। इनकी कविताओं में राष्टप्रेम, वीररस और क्रांतिकारी चेतना उत्कृष्ट रूप में देखने को मिलती है। इनके प्रसिद्ध ग्रंथो में रश्मिरथी, उर्वशी, कुरुक्षेत्र, हुंकार, परशुराम की प्रतिक्षा, रेणुका, संस्कृति के चार अध्याय, मिट्टी की ओर इत्यादि है। उर्वशी ग्रंथ पर इनको ज्ञानपीठ पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके है।
फणीश्वरनाथ रेणु :- इनका जन्म बिहार के अररिया जिले के औराही गाँव में 4 मार्च 1921 को हुआ था और मृत्यु 11 अप्रैल 1977 को। इन्होंने पटना विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण किया था। स्वतंत्रता आंदोलन के समय नेपाल के जन आंदोलन में भी शामिल हुए थे। इनकी पहचान आंचलिक उपन्यासकार के रूप में है। इनके उपन्यास में लोकभाषा के साथ-साथ यथार्थ का भी इस्तेमाल हुआ है ।
इनके प्रसिद्ध और प्रमुख ग्रंथ है :- “मैला आँचल” (आंचलिक उपन्यास), परती परिकथा, जुलूस, दीर्घतपा, तीसरी कसम इत्यादि। इन्होंने बिहार और ग्रामीण भारत की आत्मा को साहित्य के माध्यम से जीवंत किया है।
भिखारी ठाकुर :- इनका जन्म बिहार के सारण जिला (वर्तमान भोजपुर जिला) के कुतुबपुर दियारा में 18 दिसंबर 1887 को हुआ था। इनको “भोजपुरी का शेक्सपियर” कहा जाता है । इनके प्रमुख रचनाएँ है:- बिदेसिया, बेटी बेचवा, ननंद- भौजाई, कलयुग, प्रेम, भाई विरोध, इत्यादि।
नागार्जुन :- इनका जन्म बिहार के मधुबनी जिले के सतलखा गाँव में 30 जून 1911 ई० को हुआ था। इनका मूल नाम वैधनाथ मिश्र था। ये जनकवि, प्रगतिशील लेखक और चेतना के कवि थे। इनके प्रमुख रचनाओं में : युगधारा, अकाल और उसके बाद, सतरंगी पंखों वाली, बलचनमा, वरुण के बेटे इत्यादि है।
शिवपूजन सहाय :- इनका जन्म बिहार के बक्सर जिला के उनवाँस गाँव में 9 अगस्त 1893 ई० को हुआ था। ये आंचलिक कथाकार, निबंधकार, पत्रकार, संपादक और स्वतंत्रता सेनानी थे। इनके रचनाओं में ग्रामीण जीवन का यथार्थ चित्रण दिखाई पड़ता है। इनके प्रमुख रचना है:- देहाती दुनिया, कन्यादान, ग्राम्या, प्यारी दुनिया, मेरी जीवन कथा, हिंदी भाषा और साहित्य इत्यादि।
इनके अलावा रामवृक्ष बेनीपुरी, अबुल कलाम आजाद, राजकमल चौधरी, उषा किरण खान, मृणाल पांडे इत्यादि इसी तरह के अनेको सुप्रसिद्ध लेखक,कवि, साहित्यकार, इस बिहार की धरती पर जन्म लिए थे और अपनी रचनाओं के माध्यम से बिहार के गौरव को चार चाँद लगाए थे।
“बिहार की इस मिट्टी में बुद्ध का ज्ञान, महावीर की वाणी,
छठ पर्व की रौशनी में, बसी संस्कृति की कहानी,
खुशबु आती लिट्टी-चोखा की, भोजपुरी, मैथिली, मगही बहुत लुभानी,
स्वतंत्रता सेनानियों व साहित्यकारों की, याद रखे हम कुर्बानी”।।
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