रिपोर्ट: कौशलेन्द्र पाण्डेय, पटना/बिहार की राजनीति में मतदाता सूची को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा निर्वाचन आयोग को निर्देशित किए जाने की खबर के बाद कि बिहार की समस्त मतदाता सूची को निरस्त कर केवल 25 दिन में 1987 से पूर्व के कागजी प्रमाणों के आधार पर नई मतदाता सूची तैयार की जाए – विपक्ष ने इसे लोकतंत्र पर सीधा हमला बताया है।
राजद नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने इस फैसले को “चुनावी हार की बौखलाहट” में उठाया गया “बिहारियों से वोट छीनने का षड्यंत्र” करार दिया है। तेजस्वी यादव ने दावा किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के नाम पर आम नागरिकों के वोट काटे जाएंगे, जिससे उनका मतदाता पहचान पत्र नहीं बन पाएगा।
उन्होंने चेतावनी दी कि इसका असर सिर्फ वोट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे लोग राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति, आरक्षण और तमाम कल्याणकारी योजनाओं से भी वंचित हो जाएंगे, क्योंकि इन योजनाओं में वोटर ID एक प्रमुख दस्तावेज होता है।
तेजस्वी यादव ने कहा:
“1987 से पहले के कागजात कौन दिखा पाएगा? क्या 25 दिन में लाखों लोगों की जांच हो सकती है? ये पूरी प्रक्रिया ही एक सोची-समझी साजिश है ताकि गरीब, पिछड़े और वंचित तबकों को मतदाता सूची से बाहर किया जा सके। ये लोकतंत्र को कमजोर करने और संविधान को चुनौती देने वाला कदम है।”
उन्होंने यह भी बताया कि इस गंभीर मुद्दे पर महागठबंधन के सभी दलों के साथ वे जल्द ही संयुक्त प्रेस वार्ता करेंगे और जनता को जागरूक करने के लिए राज्यव्यापी अभियान चलाएंगे।
विपक्ष के आरोपों के बीच JDU और BJP ने इस कदम का समर्थन किया है। इन दलों का कहना है कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची को पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाने के लिए आवश्यक है।
अब देखने वाली बात होगी कि क्या निर्वाचन आयोग इस प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता बरतता है, या फिर यह बिहार की राजनीति में एक और विवाद की जड़ बनेगा।





























