Kaushlendra Pandey नई दिल्ली: राष्ट्रीय जनता दल के सांसद Sanjay Yadav ने संसद में स्वास्थ्य बीमा कंपनियों द्वारा क्लेम के समय की जा रही धांधली और मनमानी कटौतियों का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने कहा कि भारत में स्वास्थ्य बीमा कंपनियों का वार्षिक प्रीमियम संग्रह लगभग 3 लाख 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक है, लेकिन जब मरीज इलाज के बाद बीमा क्लेम करता है तो कंपनियां विभिन्न तकनीकी नियमों और प्रावधानों का हवाला देकर अस्पताल के बिल का बड़ा हिस्सा काट देती हैं।
सांसद ने कहा कि स्वास्थ्य बीमा का उद्देश्य नागरिकों को बीमारी के समय आर्थिक सुरक्षा देना है, लेकिन जटिल नियमों और शर्तों के कारण मरीज और उसके परिवार को अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है।
उन्होंने बताया कि यदि पॉलिसी में कमरे की किराया सीमा निर्धारित होती है और मरीज उससे महंगे कमरे में भर्ती होता है तो केवल कमरे का अंतर ही नहीं बल्कि पूरे अस्पताल बिल पर अनुपातिक कटौती (Proportionate Deduction) कर दी जाती है। इसके अलावा अस्पताल बिल में शामिल कई जरूरी चिकित्सा वस्तुएं जैसे ग्लव्स, डिस्पोजेबल आइटम, सैनिटाइजर और इंजेक्शन आदि को “नॉन-पेयेबल” बताकर क्लेम से हटा दिया जाता है।
सांसद ने यह भी कहा कि कई मामलों में बीमा कंपनियां या थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर (TPA) अस्पतालों के साथ पैकेज रेट तय कर देते हैं, जिसके कारण मरीज के वास्तविक बिल का पूरा भुगतान नहीं किया जाता। कैशलेस सुविधा होने के बावजूद डिस्चार्ज के समय मरीज को 10 से 40 प्रतिशत तक बिल खुद चुकाना पड़ता है।
सरकार से की ये प्रमुख मांगें
सांसद Sanjay Yadav ने सरकार से उपभोक्ताओं के हित में कई सुझाव दिए—
स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों में अनुपातिक कटौती (Proportionate Deduction) समाप्त की जाए।
अस्पताल बिल में शामिल आवश्यक चिकित्सा वस्तुओं को नॉन-पेयेबल सूची से हटाया जाए।
सभी बीमा पॉलिसियों के नियम सरल हिंदी और अंग्रेजी में अनिवार्य रूप से प्रकाशित किए जाएं।
डिस्चार्ज के समय डिजिटल और पारदर्शी क्लेम ब्रेकअप देना अनिवार्य किया जाए।
उपभोक्ता हित में सुधार बिना प्रीमियम बढ़ाए लागू किए जाएं।
अस्पताल बिलिंग के लिए राष्ट्रीय मानक तय किया जाए।
सांसद ने कहा कि भारत में चिकित्सा महंगाई लगभग 12–14 प्रतिशत प्रतिवर्ष है, जबकि सामान्य महंगाई 5–6 प्रतिशत के आसपास रहती है। ऐसे में क्लेम रिजेक्शन या कटौती के कारण मरीजों को भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस गंभीर मुद्दे पर विचार करते हुए ऐसी नीतियां बनाई जाएं जिससे स्वास्थ्य बीमा वास्तव में नागरिकों को बीमारी के समय आर्थिक सुरक्षा दे सके।
(रिपोर्ट: कंट्री इनसाइड न्यूज एजेंसी)





























