
यह बातें बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आचार्य सूरिदेव की ९९वीं जयंती पर आयोजित समारोह एवं कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए,सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि, ७० वर्षों से अधिक समय तक अविराम शब्द-साधना में लीन रहे आचार्यजी अपनी युवावस्था में ही राज्य-सरकार की शिक्षा-सेवा को छोड़कर, अपेक्षाकृत कम-मानदेय पर, सम्मेलन-पत्रिका ‘साहित्य’ के वर्ण-शोधक के रूप में साहित्य-सम्मेलन की सेवा आरंभ की थी। बाद में सम्मेलन के सह-संपादक भी हुए और सम्मेलन के प्रधानमंत्री के पद को भी सुशोभित किया। ९१ वर्ष की आयु में भी सक्रिए रहने वाले वे एक विरल व्यक्तित्व थे। उन्होंने साहित्य-सेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।कभी अलंकरण के पीछे नहीं भागे। अंततः अलंकरण को ही उनके पीछे आना पड़ा। बौद्ध और जैन साहित्य पर किए गए उनके कार्य अमूल्य और हिन्दी साहित्य की धरोहर है।
अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन के साहित्यमंत्री भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि उन्होंने अपने साहित्यिक अवदानों से एक चमत्कार उत्पन्न किया था। कोश निर्माण और साहित्य-संपादन में उनके कार्य विशेष उल्लेखनीय है।
वरिष्ठ साहित्यकार मार्कण्डेय शारदेय ने कहा आचार्य जी का साहित्यिक अवदान अद्भुत है। झारखंड से बिहार तक उनके साहित्यिक अवदान से ऋणी है। श्री सूरिदेव के पुत्र संगम कुमार रंजन, पुत्र वधुएँ किरण रंजन एवं विभा रंजन, वरिष्ठ कवि श्याम बिहारी प्रभाकर, संजय कुमार रंजन, ईं अशोक कुमार, डा शालिनी पाण्डेय, डा मनोज गोवर्द्धनपुरी, लता प्रासर, चंदा मिश्र तथा चित्तरंजन भारती ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए।
मंच का संचालन कुमार अनुपम ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।



























